मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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सभी प्रकार के काव्यों में संस्कृत-रूपकों का स्थान
भारतीय आलोचकों ने सब प्रकार के काव्यों में रूपक अथवा नाटक को ही सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया है ।
“काव्येषु नाटक रम्यम्”
इसका मुख्य कारण यही हो सकता है कि अहृदयों को सहृदय बनाने की पूर्ण सामर्थ्य नाटकों अथवा रूपकों में ही हुआ करती है । उदाहरण के लिए मुद्राराक्षस की प्रारम्भिक घटना को ही ले लीजिये —
इस नाटक के प्रारम्भ में प्रस्तावना की समाप्ति पर जब सूत्रधार अभिनय में भाग लेने के निमित्त अपनी पत्नी को बुलाने के लिये घर जाता है तब उसे उसकी पत्नी चन्द्रग्रहण के उपलक्ष में ब्रह्मभोज का आयोजन करती हुई दृष्टिगोचर होती है । सूत्रधार उसे समझाता है कि आज तो चन्द्रग्रहण किसी भी अवस्था में नहीं हो सकता है क्योंकि —
“क्रूरग्रह सकेतुश्चन्द्रमसम्पूर्णमण्डलमिदानीम् ।
अभिभवितुमिच्छति बलात्---”
वह इतना ही कह पाता है कि चाणक्य चन्द्रगुप्त के नाम सादृश्य से “चन्द्रस्यग्रहणम् (चन्द्रगुप्त का पकड़ लिया जाना)” समझकर कहने लगता है —
“कथय, क एष मयि स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितुमिच्छति”
अर्थात् (अपनी खुली हुई चोटी का स्पर्श करते हुये वह कहता है) मेरे रहते हुये, ऐसा कौन व्यक्ति है कि जो चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने की इच्छा करता है ।
यह कौन व्यक्ति है कि जो जंभाई के कारण खोले हुये सिंह के मुख से, शीघ्र ही पिये हुये हाथी के रक्त से लाल शोभा वाली और (अतएव) चन्द्रमा की सायंकालीन अरुण कांति से देदीप्यमान दाढ़ को (सिंह का तिरस्कार करके) उखाड़ लेने की इच्छा करता है ? (श्लोक स० १।८) ।
वध के योग्य (यह) कौन व्यक्ति है कि जो नन्दवंश के काल के लिये