मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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उपर्युक्त बातो का श्रवणकर मलयकेतु को विश्वास हो जाता है कि मेरे पिता को राक्षस ने ही मरवाया है। भागुरायण जीवसिद्धि से कहता है कि आप मुद्रा ले लीजिये, किन्तु कुमार मलयकेतु के समीप चलकर यह सब बातें उससे कह दीजिये। इसी बीच मलयकेतु अपने को प्रकट कर देता है और कहता है कि मैने सब सुन लिया है। उसका पितृ-जन्य दुःख दूना हो गया। क्षपणक वहाँ से चला जाता है। अब भागुरायण चाणक्य के आदेश "राक्षस के प्राणो की सर्वथा रक्षा की जाय" का स्मरण करते हुये मलयकेतु को समझाने लगता है कि राजनीति में शत्रु और मित्र स्वार्थवश हुआ करते हैं। उस समय राक्षस सर्वार्थसिद्धि को राजा बनाना चाहता था। इस कारण वह पर्वतेश्वर को चन्द्रगुप्त से भी अधिक शत्रु मानता था। अब वह बात नहीं है। अतः आप नन्द-राज्य को वापिस लेने के समय तक शान्त रहिये।
इसी बीच बिना मुद्रा के बाहर जाता हुआ सिद्धार्थक पकड़ा जाता है और भागुरायण तथा मलयकेतु के समक्ष लाया जाता है। उसके हाथ में एक पत्र है जिस पर राक्षस की मोहर लगी हुई है। भागुरायण मलयकेतु को यह पत्र दिखलाता है तथा सिद्धार्थक के सही-सही उत्तर न देने पर उसे पिटवाता है। पिटते समय उसकी काँख से एक आभूषणो की पेटी गिर जाती है। उस पेटी से वही आभूषण निकलता है जिसे मलयकेतु ने राक्षस के पहनने के निमित्त भेजा था। अधिक पूछे जाने पर वह कहता है कि राक्षस ने वह पत्र तथा यह आभूषण देकर मुझे चन्द्रगुप्त के समीप भेजा है।
पत्र मे लिखित तथा सिद्धार्थक द्वारा मौखिक कहा गया संदेश था—(वस्तुत सिद्धार्थक चाणक्य का गुप्तचर है।) आप द्वारा प्रेषित तीन आभूषण प्राप्त हो गये हैं। मेरे पांच प्रिय मित्रो—चित्रवर्मा, पुष्कराक्ष, सिंहनाद, सिन्धुषेन और मेघनाद—में से प्रथम तीन तो मलयकेतु का राज्य चाहते हैं तथा शेष दो क्रमशः गजसेना और कोष को चाहते हैं। अतः इनकी इच्छा की पूर्ति कीजिये। पत्र की रिक्तता के निवारणार्थ यह आभूषण प्रेषित हैं।
इसके पश्चात् मलयकेतु राक्षस को बुलवाने के लिये प्रतीहारी को भेजता है। राक्षस युद्ध-यात्रा के लिये व्यूह-रचना के प्रकार के बारे में सोच रहा है। उसी समय प्रतीहारी सूचना देती है कि मलयकेतु आपसे मिलना चाहते हैं।