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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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पर चाणक्य द्वारा प्रयुक्त अभिचार-कर्म का संकेत अवश्य मिलता है किन्तु उसका मुद्राराक्षस के कथानक से कोई सम्बन्ध दृष्टिगोचर नहीं होता ।

दशम शताब्दी की रचना 'दशरूपक' के आधार पर यह सिद्ध होता है कि मुद्राराक्षस का कथानक 'बृहत्कथा' से लिया गया है। दशरूपक में आता है :—

“तत्र बृहत्कथामूलं मुद्राराक्षसम् ।
चाणक्य नाम्ना तेनाद्य शकटारगृहे रहः ॥
कृत्यां विधाय सहसा सपुत्रो निहतो नृपः ॥
योगानन्दे यशः शेषे पूर्वनन्द सुतस्ततः ।
चन्द्रगुप्तः कृतो राज्ये चाणक्येन महौजसा ॥”

'बृहत्कथा' पैशाची-प्राकृत भाषा का ग्रन्थ है कि जो इस समय अप्राप्य भी है । 'कथासरित्सागर' को बृहत्कथा के तात्विक अंश का यथार्थ रूपान्तर माना जाता है । किन्तु 'कथासरित्सागर' में मुद्राराक्षस की कथावस्तु का विस्तृत विवरण उपलब्ध नही होता है । जो थोड़ा-बहुत मिलता भी है—उसमें नाटक के प्रतिनायक 'राक्षस' का नाम अथवा उसके कार्यों का उल्लेख तक नहीं प्राप्त होता है । अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि नाटकीय कथावस्तु का अधिकांश भाग नाटककार की अपनी कल्पना पर ही आधारित है ।

यह भी संभव हो सकता है कि लोक में प्रचलित तथा पुराणादिकों में बीज रूप मे उपलब्ध कथानक ही मुद्राराक्षस की सम्पूर्ण कथावस्तु का मूल आधार रहा हो तथा नाटककार ने अपनी कल्पनाओं के आधार पर उसे पल्लवित किया हो । इस आधार पर मुद्राराक्षस नाटक के मूलवृत्त को 'प्रख्यात' कहा जा सकता है ।

इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित कथावस्तु तथा उससे सम्बन्धित पूर्वकथा—पूर्ण—तथा ऐतिहासिक है । अतः उसको 'प्रख्यात' श्रेणी में रखना उचित ही है ।

'मुद्राराक्षस' मे वर्णित कथावस्तु से पूर्व की कथा—

लोक-परम्परा की दृष्टि से यह पूर्वकथा दो रूपों में उपलब्ध होती है । इन दोनो का सूक्ष्म वर्णन क्रमशः नीचे दिया जा रहा है :—

(१) प्राचीन काल में मगध नाम का एक राज्य था । इसकी राजधानी कुसुमपुर (पुष्पपुर) अथवा (आधुनिक पटना) पाटलिपुत्र थी । पहले यहाँ