मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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गंभीर-अमर्ष नामक भाव उतनी सशक्तता एवं गंभीरता के साथ प्रस्फुटित न हो सका होता कि जितना उपर्युक्त छन्द के प्रयोग द्वारा प्रस्फुटित हो सका है। इसी भाँति औचित्य की दृष्टि से अन्य छन्दों की भी परीक्षा की जा सकती है।
संक्षेप में यह कहा जाना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त की नाट्य-कला-कुशलता का आधार उनकी औचित्य-दृष्टि ही रही है—
“औचित्यं नाट्यजीवितम्”
ग्रन्थ का नाम मुद्राराक्षस क्यों पड़ा ?—विशाखदत्त ने अपने इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा है। यही उनकी सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है। उनकी नाट्य-प्रतिभा का पूर्ण विकसित स्वरूप इसी में देखने को मिलता है। इस नाटक में मन्त्री राक्षस ने यह प्रयत्न किया है कि किसी भाँति महाराज चन्द्रगुप्त को गद्दी से हटाया जाय। किन्तु कूटनीतिज्ञ अमात्य चाणक्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप राक्षस अपने अभीष्ट को पूरा न कर सका। वह चन्द्रगुप्त का शुभचिन्तक था। उसकी हार्दिक अभिलाषा थी कि राक्षस को चन्द्रगुप्त का मुख्य-मन्त्री बनाऊँ। उसने गुप्तचरों द्वारा राक्षस की राजकीय मुद्रा (मोहर) प्राप्त कर ली तथा उस मोहर को लगा लगाकर राक्षस के समर्थकों के समीप जाली पत्र भेजे। परिणामस्वरूप राक्षस का सहायकों के साथ मतभेद हो गया। उसका एक प्रिय मित्र चन्दनदास उसी के परिवार को छिपाकर रखने के अभियोग में राजा चन्द्रगुप्त के आदेशानुसार फाँसी पर चढ़ाया जा रहा था। राक्षस उसके बचाने के निमित्त प्रयत्न करता है। चाणक्य ने कहा कि वह उसके मित्र को फाँसी से छुड़वा देगा यदि वह चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर ले। राक्षस के पास कोई अन्य चारा ही न था। अतः उसने चन्द्रगुप्त का मन्त्री होना स्वीकार कर लिया।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि चाणक्य की इस सफलता का एकमात्र साधन, 'राक्षस की मुद्रा' ही थी। इसी आधार पर इस नाटक का नाम 'मुद्राराक्षस' रखा गया है। संस्कृत में इसकी व्युत्पत्ति इस भाँति की जाती है :—
"मुद्रया = अङ्गुलिमुद्रया, परिगृहीतः = वशीकृतः, राक्षसः यत्रेति (मध्यमपदलोपि समासः) तदधिकृत्य कृतो ग्रन्थः, मुद्राराक्षसम्। यहाँ "अधिकृत्य कृते ग्रन्थे" सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ है और तत्पश्चात् अण् प्रत्यान्त-पद होने के