मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in contextसप्तमोऽङ्कः ४११
विनय ही है। किन्तु डाह मुझे इसके उलटे दिखाती रही है। चाणक्य सब प्रकार से उचित (ही) यशस्वी है। क्योंकि—
योग्य विजयेच्छुक (राजा) को पाकर मंदबुद्धि मंत्री की भी स्थिति यशस्वी पद पर निश्चित रूप से होती है। किन्तु अयोग्य (राजा) को पाकर अनवद्यनीतिशाली मंत्री भी विनष्ट आश्रय वाला होता हुआ तटवर्ती वृक्ष के नियम से (अर्थात् किनारे के कटते किनारे खडे पेड की भाँति) धराशायी हो जाता है ॥ १४ ॥
टिप्पणी—स्पृशति माम्—राक्षस सोचता है कि अभी न तो मैंने इसका अमात्यपद स्वीकार किया है और न इसने मुझे इसके लिए आमन्त्रित ही किया है। तो भी यह मुझे अपना सेवक समझ रहा है। अथवा विनय एवैष चन्द्रगुप्तस्य—फिर राक्षस सोचता है कि नहीं, यह इसकी विनयशीलता ही है। मैं डाह के कारण इसको गलत समझ रहा था। स्थाने—युक्त, ठीक ही। द्रव्यम्—भव्य, योग्य। द्रवति ऊर्ध्वं गच्छति इति √द्रु (गतौ) + डु कर्तरि = द्रुः = वृक्षः। द्रुरिव इति द्रु + यत् इवार्थे = द्रव्यम्। यह 'जिगीषुम्' का विशेषण है, जिसका संकेत 'चन्द्रगुप्त' से है। अधिगम्य—यहाँ शंका हो सकती है कि 'अधिगम्य' और 'भवति' दोनों क्रियाओं के भिन्न-भिन्न कर्ता होने से क्त्वा प्रत्यय नहीं होना चाहिए, किन्तु 'जिगीषुमधिगम्य स्थितस्य नेतुः प्रतिष्ठा भवति' ऐसी विवक्षा करने से क्त्वा प्रत्यय हो सकता है। नेतुः प्रतिष्ठा नियता—इसका संकेत चाणक्य से है। अद्रव्यम्—इसका संकेत मलयकेतु से है। शुद्धनयः—शुद्धः अनवद्यः नयः नीतिप्रयोगः यस्य तादृशः। इसका संकेत स्वयं (राक्षस) से है। शीर्णाश्रयः—आश्रीयते इति आ√श्रि + अच् कर्मणि = आश्रयः = अवलम्बः। शीर्णः उत्खातः आश्रयः यस्य तादृशः। पतति—वृक्षपक्षे भुवि = पृथिव्यां पतति। मन्त्रिपक्षे भुवि = जगति लोकसमाजे पतति = न्यग्भवति। इस श्लोक में अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार, तन्मूलक अर्थान्तरन्यास अलंकार, अर्थापत्ति अलंकार और निदर्शनालंकार का सांकर्य है। इसमें वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥ १४ ॥
चाणक्यः—अमात्य राक्षस ! अपीष्यते चन्दनदासस्य जीवितम् ?
राक्षसः—भो विष्णुगुप्त ! कुतः सन्देहः ?