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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 48 of 488

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Page 48

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“कामं नन्दमिव प्रमथ्य जरया चाणक्यनीत्या यथा
धर्मो मौर्य इव क्रमेण नगरे नीतः प्रतिष्ठां मयि।
तं सम्प्रत्युपचीयमानमपि मे लब्धान्तरः सेवया
लोभो राक्षसवञ्चनाय यतते जेतुं न शक्नोति च॥” २।६॥

इस उद्धरण में कवि-कल्पना की उड़ान का दर्शन भले ही न हो किन्तु नाटकीय-वृत्त और चरित्र की अभिव्यञ्जना बड़ी ही सुन्दर प्रतीत होती है। इसी प्रकार शकटदास की ‘दृष्ट्वा मौर्यमिव……’ इत्यादि [मुद्रा० २।२१] उक्ति में नाटककार की काव्य-कल्पना की उड़ान भले ही विद्यमान न हो किन्तु उसमें नाटकीय औचित्य की सतर्कता का दर्शन अवश्य ही होता है।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त की अपनी एक शैली है। वे अपनी कला के स्वयं ही निर्माता तथा निर्वाहकर्त्ता हैं। “राजनीतिक धोखा किस भाँति दिया जाना उचित कहा जा सकता है”, इसका सूक्ष्म और यथार्थ विश्लेषण ही उनकी कला की प्रमुख विशेषता है। उनकी शैली नाटक के विषय के अनुसार परिवर्तित होती रहती है। उसमें स्थान-स्थान पर गम्भीरता, सशक्तता एवं प्रभावोत्पादकता का दर्शन होता है। कथावस्तु का निर्वाह कला-त्मक दृष्टि के अनुरूप ही हुआ है। राजनीति सदृश नीरस विषय को काव्य एवं नाटक का विषय बना देना, उसमें सजीवता, सरलता, मनोरंजकता आदि का समावेश कर उसे अभिनय सम्बन्धी गुणों से परिपूर्ण कर देना विशाखदत्त जैसे उन्नत कोटि के कलाकार का ही काम है। इस दृष्टि से उनकी गणना मूर्धन्य कलाकारों की श्रेणी में की जा सकती है। मुद्राराक्षस के प्रथम अंक में वर्णित चाणक्य की स्वगतोक्ति तथा षष्ठ अंक में वर्णित राक्षस की स्वगतोक्ति को नाटकीय दृष्टि से लम्बा तथा विस्तृत अवश्य कहा जा सकता है, किन्तु चाणक्य की स्वगतोक्ति से चाणक्य की राजनीति का विशद्-विवेचन उपलब्ध हो जाता है तथा राक्षस की स्वगतोक्ति से राक्षस की मानवीय-प्रकृति का, उसकी कोमल-भावनाओं का तथा उसकी भावात्मक अनुभूतियों का ज्ञान पाठक अथवा दर्शक को स्पष्ट रूप से हो जाता है। एक निराश महान् व्यक्तित्व की प्रकृति के साथ तन्मयता एव एकलयता का जैसा चित्रण उपस्थित किया गया है, भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से उसे अनुपम ही कहा जा सकता है।