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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 477

४०६ मुद्राराक्षसम्

फलयोगमवाप्य सायकाना-
मनियोगेन विलक्षता गतानाम् ।
न शुचेव भवत्यधोमुखानां
निजतूणीशयनव्रतं प्रतुष्ट्यै ॥१०॥

**अन्वय—**फलयोगम् अवाप्य अनियोगेन विलक्षता गतानाम् शुचेव अधोमुखाना ( मम ) सायकाना निजतूणीशयनव्रत प्रतुष्ट्यै न भवति ॥ १० ॥

**व्याख्या—फलयोगम्—**फलेन शत्रुजयरूपेण योग समागतम् पक्षान्तरे फलेन लोहमयाग्रकीलेन योगम् सम्बन्धम्, **अवाप्य—**प्राप्य, **अनियोगेन—**नियोगायोग्यत्वेन पक्षा तरे अप्रेरणया, **विलक्षता—**लज्जावत्ता पक्षांतरे अशरव्यता, **गतानाम्—**प्राप्तानाम् । **शुचेव—**दु खेनेव, **अधोमुखाना—**नतास्यानाम् पक्षान्तरे आनताग्रभागाना, ( **मम—**अस्माकमित्यर्थ ), **सायकाना—**बाणानाम्, **निजतूणीशयनव्रतम्—**स्वगृहे निर्व्यापारतयाऽवस्थानम् पक्षान्तरे स्वेपुधिनिश्चलावस्थितिनियम , **प्रतुष्ट्यै—**प्रीत्यै, **न भवति—**न जायते ॥ १० ॥

**हिन्दी अनुवाद—**इसलिए यह चन्द्रगुप्त आपको देखने के लिए आ रहा है । देखिए इसे—

राक्षस—[ मन में ] क्या उपाय है ? [ प्रकट ] यह देखता हूँ ।

[ तदनन्तर राजा और ऐश्वर्य के अनुसार अनुचरगण प्रवेश करते हैं । ]

राजा—[ मन में ] बिना युद्ध के ही आर्य ( चाणक्य ) ने कठिनाई से जीतने योग्य शत्रु-कुल को परास्त कर डाला, इससे मैं लज्जित-सा हूँ । मेरे तो—

लोहे के अग्रवर्त्ती कील से सम्बन्ध प्राप्त करके ( भी ) बिना चालन के लक्ष्यहीनता को प्राप्त किये हुए और ( अतएव ) मानो शोक से झुके हुए अग्रभाग वाले बाणों का अपने तूणीर मे निश्चल होकर पड़ा रहना सन्तोष के लिए नही हो रहा है । पक्षान्तर मे—कार्य-सिद्धि को प्राप्त करके ( भी ) आज्ञा देने के योग्य न होने के कारण लज्जा को प्राप्त किये हुए और ( अतएव ) मानो शोक से नीचे मुख किये हुए हमारा निश्चेष्ट होकर अपने घर मे पड़ा रहना सन्तोष के लिए नही हो रहा है ॥ १० ॥