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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 472 of 488

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Page 472

सप्तमोऽङ्कः ४०१

हिन्दी अनुवाद— [ तदनन्तर पर्दे से ढके हुए शरीर वाला और केवल मुख से देखे जाने योग्य प्रसन्न चाणक्य प्रवेश करता है। ]

चाणक्य— भद्र ! कहो, कहो—

ऊँची लपटों के समूह से ललाई लिये भूरे रंग की अग्नि को कपड़े की छोर मे किसने बाँधा ? वायु की गति का निरोध किसने तत्काल रस्सियों से कर डाला ? हाथियों के मद-जल से भीनी सटाओं वाले सिंह को किसने पिजड़े में डाल दिया ? (और) चंचल नाकों और मगरों वाले भयंकर समुद्र को किसने बाँहों से पार किया ? ॥ ६ ॥

टिप्पणी—जवनिका— पर्दा। जु√ (सौत्रो धातु) + ल्युट् करणे + कन् स्वार्थे स्त्रियाम् = जवनिका । 'प्रतिसीरा जवनिका स्यात्तिरस्करिणी च सा' इत्यमरः । सदागतेः— सदा सततं गतिः गमनं यस्य स सदागतिः = वायुः, तस्य। 'श्वसनः स्पर्शनो वायुर्मातरिश्वा सदागतिः' इत्यमरः । अगतिता— अविद्यमाना गतिर्यस्य सः अगतिः नञ्बहुव्रीहि स० । तस्य भावः अगतिता गतिनिरोध इत्यर्थः । अनेकप— न एकः अनेकः । अनेकञ्च अनेकञ्च अनेकौ । अनेकाभ्यां पिबति इति अनेक√पा + क कर्तरि = अनेकपः । इस श्लोक का निचोड़ यह है कि वस्त्र की छोर से अग्नि को बाँधने की तरह, रस्सी से वायु को बाँधने की तरह, पिंजड़े में सिंह को बन्द करने की तरह, और भुजाओं से महासागर को पार करने की तरह राक्षस को बाँधने का दुष्कर कार्य मैंने किया है। इस पद्य मे अप्रस्तुतप्रशंसा, अतिशयोक्ति और मालानिदर्शनालंकार में अंगांगिभाव से सांकर्य है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ ६ ॥

चण्डालः— णं णीदिणिउणबुद्धिणा अज्जेण ज्जेव। (ननु नीति-निपुणबुद्धिनार्येणैव ।)

चाणक्यः— भद्र ! मा मैवम्। नन्दकुलद्वेषिणा दैवेनेति ब्रूहि ।

राक्षसः— [ विलोक्य स्वगतम् ] अये ! अयं स दुरात्मा, अथवा अयं स महात्मा कौटिल्यः । यतः—

मु० रा०—२६