मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context३८० मुद्राराक्षसम्
इसमें मन्दाक्रान्ता छन्द है। इस छन्द का लक्षण यह है—'मन्दाक्रान्ता जलधि-षड्गैर्म्भो न तौ नाद्गुरू चेत्' ॥१६॥
पुरुष — अज्ज ! एव सेट्ठिचन्दनदामजीविद होदि त्ति सुणिद, विसमदसाविभाअपरिणामपडिदो ण सक्कणोमि णिच्चिदपद पडिवत्तु। [ विलोक्य पादयोर्निपत्य ] अय मुगिहीदणामधेआ अमच्चरक्खसपादा तुम्हे त्ति ता करेहि मे प्पसाद सदेहणिण्णएण । (आर्य ! एव श्रेष्ठिचन्दनदामजीवित भवतीति श्रुत, विषमदशाविभागपरिणामपतितो न शक्नोमि निश्चितपद प्रतिपत्तुम् । अय सुगृहीतनामधेया अमात्यराक्षसपादा यूयमिति, तत् कुरु मे प्रसाद सन्देहनिर्णयेन ।)
राक्षस — भद्र ! सोऽहमनुभूतभर्तृवंशविनाश सुहृद्विनाशहेतुरनार्यो दुगृहीतनामा यथार्थो राक्षस ।
पुरुष — [ सहर्षं पादयोर्निपत्य ] पसीदध, प्पसीदध । हीमाणहे ! दिट्ठिआ कदत्थोम्हि । (प्रसीदत, प्रसीदत । आश्चर्यम् ! दिष्ट्या कृतार्थोऽस्मि ।)
राक्षस — भद्र ! उत्तिष्ठोत्तिष्ठ, कृतमिदानी कालहरणेन, निवेद्यता जिष्णुदासाय, यथैष राक्षस चन्दनदास मरणान्मोचयति । [ इति 'निस्त्रिंशोऽद्य' इत्यादि पठन् आकृष्टखङ्ग परिक्रामति । ]
**हिन्दी अनुवाद—पुरुष—**आर्य ! इस प्रकार सेठ चन्दनदास का जीवन रह जाएगा, यह सुन लिया । किन्तु सकटपूर्णा अवस्था-विशेष के परिणाम मे निमग्न मै (आपको) निश्चित रूप मे जानने मे समर्थ नही हूँ । [ देखकर पैरो पर गिर कर ] क्या आप प्रात स्मरणीय अमात्य राक्षस हैं ? तो मेरे सन्देह का निर्णय करने की कृपा कीजिये ।
**राक्षस—**भद्र ! वह मै स्वामी के वंश के विनाश का अनुभव करने वाला मित्रो के विनाश का कारण, अनार्य, नाम न लिये जाने के योग्य तथा अर्थ के अनुरूप राक्षस हूँ ।
पुरुष—[ हर्ष के साथ फिर पैरो पर गिर कर ] प्रसन्न हो, प्रसन्न हो । आश्चर्य है ! भाग्य से मैं कृतार्थ हो गया हूँ ।