मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context१६२ मुद्राराक्षसम्
अलकार हैं। इसमे शिखरिणी छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १३ में देखिए ॥११॥
अपि च अय—
क्षताङ्गाना तीक्ष्णै परशुभिरुदग्रैः क्षितिरुहा
रुजा कूजन्तीनामविरतकपोतोपरुदितै ।
स्वनिर्मोकच्छेदै परिचितपरिक्लेशकृपया
श्वसन्त शाखाना व्रणमिव निबध्नन्ति फणिनः ॥१२॥
**अन्वयः—**तीक्ष्णैः उदग्रैः परशुभिः क्षताङ्गाना क्षितिरुहा रुजा अविरत-कपोतोपरुदितै कूजन्तीना शाखाना व्रण फणिन परिचितपरिक्लेशकृपया श्वसन्त' स्वनिर्मोकच्छेदै निबध्नन्ति इव ॥१२॥
**व्याख्या—**तीक्ष्णै —शितधारै , उदग्रै —उन्नताग्रभागैः, परशुभिः—कुठारैः, क्षताङ्गाना—भिन्नदेहानाम्, क्षितिरुहा—वृक्षाणा, रुजा—पीडया, अविरतकपोतोपरुदितैः—अविरतानि अविच्छिन्नानि यानि कपोतानां—पारावतानाम् उपरुदितानि कूजनानि तै , कूजन्तीना—शब्द कुर्वन्तीना, शाखाना—विटपाना, व्रण —क्षत, फणिन —सर्पाः, परिचितपरिक्लेशकृपया—परिचितस्य सहवासविज्ञातस्य य परिक्लेशः यातना तत सञ्जाता या कृपा दया तया हेतुना, श्वसत —दीर्घनि श्वास त्यजन्त', स्वनिर्मोकच्छेदैः—स्वेषाम् आत्मनाम् ये निर्मोका कञ्चुकरूपवस्त्राणि तेषा छेदै खण्डैः निबध्नन्ति इव—वेष्टयन्ति इव ॥१२॥
हिन्दी अनुवाद—और भी यहाँ—
तीक्ष्ण एवम् उन्नत अग्र भाग वाली कुल्हाडियो से कटे हुए अगों वाले वृक्षो की पीडा मे निरन्तर कबूतरों के शब्दों से ( मानो ) विलाप करती हुई शाखाओ के घाव को सांप परिचितो की वेदना से उत्पन्न करुणा के कारण आह खीचते हुए अपनी केंचुली ( रूपी वस्त्रो ) के टुकडो से मानों बांध रहे हैं ॥१२॥
**टिप्पणी—उदग्रै क्षितिरुहा—**इसके स्थान में 'उदग्रक्लमभृता' यह पाठ भी मिलता है । उसकी व्याख्या होगी—'उदग्र कठोर यः क्लमः क्लान्ति