मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
Page 435 of 488
Read in context३५८ मुद्राराक्षसम्
चित्र—महदाश्चर्यकारि, बाणमोक्ष.—शरत्याग., अकारि—कृत., अस्याम्—
अमुष्याम्, उद्यानराजौ—उपवनपक्तौ, स्थितम्,—क्षणमुषितम्, इह—
अस्मिन् स्थले, राजभि —नृपै, ( सह ) कथित—सम्भाषितम्, सम्प्रति—
इदानीम्, तै —तदादिभिः राजभिः, विना—अन्तरा, इत्थम्—अनेन प्रकारेण,
आलोक्यमाना —दृश्यमाना , कुसुमपुरभुव ,—पाटलिपुत्रभूमयः भूयसा—
आधिक्येन, दु खयन्ति—क्लेशयन्ति ॥ ६ ॥
हिन्दी अनुवाद—इसलिए राक्षस अब भी शत्रु के हाथ में पड़कर नष्ट हो जायेगा, किन्तु चन्द्रगुप्त के साथ संधि नहीं करेगा। अथवा ( यह ) प्रतिज्ञा को पूर्ण करने वाला नहीं है—ऐसा अपयश मेरे लिए कही अच्छा है, किन्तु शत्रु के छल से पराजित होना ( अच्छा ) नहीं है। [ चारों ओर देखकर आंसू के साथ ] ये वे महाराज के चरणों के यास के परिचय से ( अर्थात् चरणों के बार-बार पड़ने से ) पवित्र किये हुए राजमार्ग ( या सतह ) वाली पाटलिपुत्र की समीपवर्तिनी भूमियाँ हैं।
यहाँ—
इस स्थान पर धनुष की डोरी के खींचने में छोड़ी हुई ढीली बागडोर वाले महाराज ने घोड़े को दौड़ाते हुए तथा आश्चर्यजनक रूप से लक्ष्यों पर बाणों को छोड़ा था। इस उपवन की पंक्ति में बैठे थे। यहाँ राजाओं के साथ बातचीत की थी। इस समय उनके बिना इस प्रकार देखी जाती हुई पाटलिपुत्र की भूमियाँ अत्यन्त क्लेश पहुँचा रही हैं ॥ ६ ॥
टिप्पणी—अरातिहस्तगतः—अराति शत्रु चन्द्रगुप्त । तस्य हस्तः । त गत द्वितीयातत्० । कामम्—यथेच्छम् । असत्यसन्ध —असत्या सधा प्रतिज्ञा यस्य स । वरम्—प्रियम् । अयश —अकीर्ति । शत्रुवञ्चनपरिभूति—शत्रो चाणक्यस्य वञ्चनेन प्रतारणेन परिभूति पराजयः । पादक्रमणपरिचयपवित्रीकृतरथ्या —पादक्रमण चरणाञ्चार तस्य यः परिचय. उपलब्धि तेन पवित्रीकृता पूता रथ्या प्रतोली यत्र तथाविधा । कुसुमपुरोपकण्ठभूमय —कुसुमपुरसमीपप्रदेशा । प्रजवित—प्रकृष्ट जव प्रजव प्रादिस० । स सञ्जात अस्य इति प्रजव+इतच् । तै —यह नन्द को सूचित करता है। आदरे बहुवचनम् । इस श्लोक में स्वभावोक्ति, दीपक तथा विनोक्ति