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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

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विशाखदत्त के पिता पृथु तथा अजमेर-निवासी पृथुराय दोनों ही पृथक्-पृथक् व्यक्ति हैं क्योंकि विशाखदत्त के पिता 'महाराज' पद द्वारा सम्बोधित किये गये हैं तथा अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं।

इसके अतिरिक्त 'मुद्राराक्षस' में वर्णित नाटककार के पिता एवं पितामह आदि को 'सामन्त' कहा गया है। वह जिस राजा के सामन्त पद पर आसीन होकर शासन कार्य भी संभाला करते थे वह भारत का एकछत्र सम्राट् था (भरतवाक्य मे आता ही है :—सः•••••••••चिरमवतु महीं•••••• इत्यादि)। इस आधार पर प्रो० विल्सन का मत एकदम निराधार ही हो जाता है। इसके अतिरिक्त जर्मन विद्वान् हिलीब्राण्ट महोदय ने अपने द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में 'भास्करदत्त' नाम को ही प्रामाणिक रूप में स्वीकार किया है।

नाटककार ने अपनी कृति 'मुद्राराक्षस' में उत्तर भारत का जो विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है उससे यह बात सहज ही स्पष्ट हो जाती है कि विशाखदत्त उत्तर भारत के ही निवासी थे। इस विचार की पुष्टि नाटक में वर्णित काशपुष्पों तथा हंस के वर्णन से भी हो जाती है। काशपुष्प तथा हंस उत्तर भारत की नदियों के किनारे ही पाये जाते हैं। तृतीय अङ्क में शरद् ऋतु सम्बन्धी वर्णन देखिये :—

"आकाशं काशपुष्पच्छविमभिभवता भस्मना शुक्लयन्ती
शीतांशोरंशुजालैर्जलधरमलिनां क्लिन्दन्ती कृत्तिमैभीम् ।
कापालीमुद्वहन्ती स्रजमिव धवला कौमुदीमित्यपूर्वा
हासश्रो राजहंसा हरतु तनुरिव क्लेशमैशी शरद.॥" ३।२०॥

गङ्गा के किनारे स्थित पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) के विशद् वर्णन से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटककार इस प्रदेश के भूभाग से भली भाँति अवगत है तथा इसी ओर का निवासी है। प्रस्तावना में ही सूत्रधार कहता है :—

"चीयते बालिशस्यापि सत्क्षेत्रपतिता कृषिः ।
न शालेः स्तम्बकरिता वप्तुर्गुणमपेक्षते ॥" १।३॥