मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
Page 417 of 488
Read in context३४० मुद्राराक्षसम्
(जयति जलदनील केशव केशिघाती
जयति च जनदृष्टेश्चन्द्रमाश्चन्द्रगुप्त ।
जयति जयनसज्ज या अकृत्वा च सैन्य
प्रतिहतपरपक्षा आर्यचाणक्यनीति ॥ १ ॥ )
अन्वय —जलदनील, केशिघाती केशव जयति । जनदृष्टे चन्द्रमा चन्द्रगुप्तश्च जयति । आर्यचाणक्यनीतिश्च जयति या जयनसज्ज सैन्यम् अकृत्वा प्रतिहतपरपक्षा ( विद्यते ) ॥ १ ॥
व्याख्या—जलदनील —जलद मेघ इव नील श्याम, केशिघाती—केशिनामदैत्यविनाशक, केशव —कृष्णावतार श्रीविष्णु, जयति—उत्कर्षं लभते । जनदृष्टे —लोकलोचनस्य सम्बन्धे, चन्द्रमा —चन्द्र ( इव ), चन्द्रगुप्तश्च—मौर्यश्च, जयति—उत्कर्षं लभते । आर्यचाणक्यनीतिश्च—पूज्यकौटिल्यनयश्च, जयति, या—चाणक्यनीति, जयनसज्ज—जयन युद्धादि तदर्थं सज्जा वेशो यस्य तादृश, सैन्यम्—सेनाम्, अकृत्वा—अविधाय सैय विनेवेत्यर्थः, प्रतिहतपरपक्षा—प्रतिहत विनाशित परपक्ष शत्रुपक्ष यया तादृशी, ( विद्यते ) ॥ १ ॥
हिन्दी अनुवाद—[ तदनन्तर अलङ्कारयुक्त एवम् प्रसन्न सिद्धार्थक प्रवेश करता है। ]
सिद्धार्थक—मेघ के समान श्याम वर्ण वाले तथा केशी नामक राक्षस को मारने वाले विष्णु की जय हो, मनुष्यों की दृष्टि के लिए चन्द्रतुल्य चन्द्रगुप्त की जय हो और युद्धार्थ उद्यत सेना के बिना ही शत्रुपक्ष को नष्ट कर देने वाली आर्य चाणक्य की नीति की जय हो ॥ १ ॥
टिप्पणी— इस प्रकार मलयकेतु के निग्रह रूप अवांतर कार्य सम्पन्न हो जाने के बाद राक्षस को वश में करने के लिए तथा मौर्य की लक्ष्मी को सुदृढ करने रूप महान् फल की सिद्धि के लिए छठे और सातवें अको का उपक्रम किया गया है। जलदनील —जल ददातीति जलद । तद्वत् नील जलदनील उपमितकर्मधारय स० । केशिघाती—केशिन हन्तु शीलमस्य इति केशिन्√हन्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये । केशवः—क ब्रह्माणम् ईशं रुद्रञ्च वर्तयति इति