मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in contextपञ्चमोऽङ्कः ३३५
मलयकेतु—तब किसने पिता जी को मारा ?
राक्षस—इस बारे में भाग्य से पूछना चाहिए ।
मलयकेतु—[ क्रोध के साथ ] इस बारे में भाग्य से पूछना चाहिए, और क्षपणक जीवसिद्धि से नहीं ?
राक्षस—[ मन में ] क्या जीवसिद्धि भी चाणक्य का गुप्तचर है ? हाय ! शत्रुओं ने मेरे हृदय पर भी अधिकार कर लिया ।
मलयकेतु—[ क्रोध के साथ ] भामुरक ! सेनापति शिखरसेन को आज्ञा दे दो कि ये जो मेरे शरीर से द्रोह करने वाले राक्षस के साथ मित्रता करके चन्द्रगुप्त की सेवा करने के इच्छुक पाँच राजा, जैसे—कुलूत का चित्रवर्मा, मलय का राजा सिंहनाद, काश्मीर का पुष्कराक्ष, सिन्धु का राजा सुषेण और पारसीक का अधिपति मेघाक्ष है, इनमें से पहले तीन मेरी भूमि चाहते है। उन्हे गहरे गड्ढे में ले जाकर मिट्टी से तोप दो और गजसेना चाहने वाले अन्य दो ( राजाओं ) को हाथी से मरवा ही डालो ।
पुरुष—जो कुमार की आज्ञा । [ बाहर चला जाता है ।]
मलयकेतु—[ क्रोध के साथ ] राक्षस ! राक्षस ! मैं विश्वासघाती राक्षस नहीं हूँ । मैं मलयकेतु हूँ । इसलिए जाओ । सब तरह से चन्द्रगुप्त का आश्रय लो ।
तुम्हारे सहित आये हुए चाणक्य और चन्द्रगुप्त को विनष्ट करने में मैं उसी तरह समर्थ हूँ जैसे दुर्नीति धर्म, अर्थ और काम को ( विनष्ट करने में समर्थ होती है ) ॥२२॥
टिप्पणी—गण्डस्य—मर्मस्थान में हुए फोडे को गंड कहते है । विस्फोटः—फोड़ा । आरोपितवान्—प्रयुक्तवान् । दैवमत्र—राक्षस के पास इसका कोई प्रमाण नही है कि चाणक्य ने पर्वतेश्वर को नही मरवाया है । इसलिए 'वह भाग्य से पूछने को कहता है । वह अपनी सारी असफलताओं पर भाग्य को ही दोष देता है । छठे अंक में उसने कहा है—'दैवं हि नन्दकुलशत्रुरसौ न विप्रः' । वह 'दैवाधीनं जगत्सर्वम्' इस शास्त्रवचन पर पूर्ण विश्वास करते हुए दिखाई पडता है । हृदयमपि—राक्षस जीवसिद्धि को अभिन्नहृदय समझता