मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context१२६ मुद्राराक्षसम्
किया हुआ यह आभूषण कैसे ? [ प्रकट ] आर्य ! यह आभूषण कहाँ से ( प्राप्त किया ) ?
राक्षस—बनियों से खरीदकर प्राप्त किया।
मलयकेतु—विजये ! क्या तुम इस आभूषण को पहचानती हो ?
प्रतीहारी—[ भली भाँति देखकर आंसू के साथ ] कैसे न पहचानूंगी ? यह तो पहले प्रात स्मरणीय महाराज पर्वतेश्वर के द्वारा धारण किया गया है।
मलयकेतु—[ आंसू के साथ ] हाय पिता जी !
हे कुलभूषण ! आभूषण के प्रेमी आपके शरीर के योग्य ये वे आभूषण हैं, जिनसे सुशोभित होकर ( अपने ) चन्द्रतुल्य मुख से कान्ति फैलाते हुए आप नक्षत्रों से युक्त शरत्कालीन प्रदोष के समान लगते थे ॥१६॥
टिप्पणी—तन्मध्यात्—'तत्' अलङ्कारत्रय को सूचित करता है। यहाँ बुद्धिस्थ अपादान की अपेक्षा करके पञ्चमी हुई है। इस प्रश्न से मलयकेतु की बुद्धिहीनता सूचित होती है। क्योकि उसकी दृष्टि में राक्षस चन्द्रगुप्त से मिला हुआ है, ऐसी स्थिति में राक्षस चन्द्रगुप्त का दिया हुआ पर्वतेश्वर वाला आभूषण पहनकर मलयकेतु के पास कैसे आ सकता है। यदि कहे कि राक्षस को इसका ज्ञान नही है कि यह आभूषण किसका है तो भला चन्द्रगुप्त ही मलयकेतु के पास रहते हुए राक्षस को यह आभूषण कैसे भेज सकता है, जबकि वह राक्षस से गुप्त सन्धि कर चुका है। क्या कभी इस आभूषण के देख लेने से मलयकेतु के मन में राक्षस के प्रति सन्देह नही उत्पन्न हो सकता है ? प्रत्यभिजानासि—प्रति-अभि√ज्ञा+लट्—सि । अत्र 'सम्प्रतिभ्यामनाध्याने' इति सूत्रेण नात्मनेपदम् अभिना व्यवधानात् । धारितपूर्वम्—धृतपूर्वम् । 'धारित' इत्यत्र स्वार्थे णिच् । असि—अभू । अत्र वर्तमानसामीप्ये भूतार्थे लट् । इस श्लोक में लाटानुप्रास, रूपक और उपमा का सन्देहसङ्कर, प्रतीयमानोपमा और पूर्णोपमा अलङ्कार हैं। इसमे वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ मे देखिये ॥१६॥
राक्षस—[ स्वगतम् ] कथं पर्वतेश्वरधृतपूर्वाणीत्याह ? [ प्रकाशम् ] व्यक्तमेतान्यपि तेन चाणक्यप्रयुक्तेन वणिग्जनेनास्मासु विक्रीतानि ।