मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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इसी प्रकार १०वीं शताब्दी में विद्यमान धनंजय ने अपने ग्रन्थ ‘दशरूपक’ में मुद्राराक्षस का संकेत निम्नलिखित रूप में किया है :-
“तत्र वृहतकथामूलं मुद्राराक्षसम्” —दशरूपक १।६८ के नीचे
तथा—
“मन्त्रशक्त्या, यथा मुद्राराक्षसे राक्षसहायोदीनां चाणक्येन स्वबुद्ध्या भेदनम्” इत्यादि —दशरूपक २।५५ के नीचे
इसके अतिरिक्त इसी दशरूपक के द्वितीय प्रकाश में नायक के सामान्य गुणों की चर्चा करते हुये “स्थिर:” इस विशिष्ट गुण को स्पष्ट करते हुए लिखा है :—
यथा वा भर्तृहरिशतके [ नीति शतक श्लोक—२६ ]—
“प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमगुणाः न परित्यजन्ति” ॥ मुद्रा० २।१६॥
किन्हीं-किन्ही प्रतियों में इस श्लोक का अन्तिम चरण निम्नलिखित रूप में मिलता है :—
“प्रारब्धमुत्तमगुणास्त्वमिवोद्वहन्ति”
इसमें आये हुये “त्वमिव” की संगति मुद्राराक्षस में तो ठीक बैठ जाती है किन्तु भर्तृहरि शतक में ठीक नही बैठती । इससे ज्ञात होता है कि यह श्लोक मुद्राराक्षस का ही है तथा भर्तृहरि ने इसको वहीं से ले लिया होगा । यदि इसको ठीक मान लिया जाय तो विशाखदत्त की स्थिति भर्तृहरि से पहले सिद्ध हो जाती है । भर्तृहरि का समय ६५१ ई० के लगभग माना गया है। अतः विशाखदत्त का समय इससे पहले का ही रहा होगा ।
मुद्राराक्षस का घटनास्थल पाटलिपुत्र ( आधुनिक पटना ) है । मुद्राराक्षस में इसका वर्णन एक प्रसिद्ध गौरवशाली नगर के रूप में किया गया है। इसको पुष्पपुर अथवा कुसुमपुर नाम से भी कहा गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसकी सत्ता सिद्ध होती है । चीनी यात्री फाह्यान ने अपनी मध्य-एशिया की यात्रा ३६६ ई०