Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 391 of 488

Read in context
Page 391

३१०
मुद्राराक्षसम्

साध्य (वह्नि आदि मे) निश्चित रूप से है, सपक्ष (महानस आदि) मे सत्ता धारण करता हुआ अन्वय-व्याप्ति से विशिष्ट है और विपक्ष (जलाशय आदि) मे निवृत्त (अर्थात् वहाँ नही रहता) है वह (वह्नि के अनुमान की) सिद्धि के लिये (समर्थ) होता है। किन्तु जो हेतु स्वयं ही साध्य (अर्थात् दूसरे हेतु से अनुमान करने योग्य) है तथा सपक्ष और विपक्ष दोनो मे समान है और जो हेतु पक्ष मे विपरीत है, उस हेतु के स्वीकार करने से स्वामी की तरह वादी का पराजय होता है। (स्वामी के पक्ष मे—) साध्य (शत्रु विनाश रूप कार्य) मे लगी हुई जो सेना वंशपरम्परा से आयी हुई है और अपने वर्ग में स्थिति धारण करती हुई शत्रु-वर्ग मे विमुख है, वह कार्य-सिद्धि के लिए (समर्थ) होती है। किन्तु जो सेना स्वयं ही साध्य है (अर्थात् वंश परम्परा से आयी हुई की तरह सिद्ध नहीं है) तथा अपने पक्ष और शत्रु-पक्ष मे समान (आदर रखती) है और जो सेना अपने पक्ष मे विपरीत है, उसके स्वीकार करने से वादी की तरह स्वामी का पराजय होता है ॥ १० ॥

टिप्पणी—साधनम्—साध्यते अनेन इति √साध् +ल्युट् करणे। हेतु, पक्षान्तर मे—सेना। 'साधन सिद्धिसैन्ययो' इति हैम। साध्ये—√साध् +ण्यत् कर्मणि = साध्य—वह जिसे सिद्ध करना है। जैसे 'पर्वतोऽयं वह्निमान् धूमात्' मे वह्निमत्त्व या वह्नि साध्य है। पक्षान्तर मे—जिसे प्राप्त करना है। निश्चितम्—असन्दिग्ध। पक्षान्तर मे—धृतसङ्कल्प। सपक्षे—पक्षेण सह वर्तमान इति सपक्ष। निश्चितसाध्यवान् सपक्ष। जिसमे साध्य या अनुमान का विषय हो। पक्षान्तर मे—समान पक्ष अस्य इति सपक्ष। एक ही (समान) पक्ष का। अन्वयेन घटितम्—अनु√इ+अच् भावे = अन्वय। तत्सत्त्वे तत्सत्त्वम्। उस (हेतु) के रहने पर उस (साध्य) की सत्ता निश्चित है, फलतः हेतु और साध्य का साहचर्य। पक्षान्तर मे—अनु√इ+अच् अधिकरणे = अन्वय = वंश। √घट्+णिच्+क्त कर्मणि = घटित 'मिता ह्रस्व' इति ह्रस्व। युक्त। पक्षान्तर मे—लब्ध। सिद्धये—सिद्धि (वह्नि की अनुमिति, पक्षान्तर मे—विजयादि की प्राप्ति) के लिए। विपक्षतः—विभिन्न पक्षात् विपक्ष प्रादितत्० पक्ष से भिन्न वस्तु (जलाशय