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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 387 of 488

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Page 387
३०६मुद्राराक्षसम्

सिद्धार्थक—णिसामेदु कुमालो, अह क्खु अमच्चरक्खसेण इम लेह देइअ, चन्दउत्तसआस प्पेसिदोम्हि । ( निशामयतु कुमार, अह खल्वमात्यराक्षसेनेम लेख दत्त्वा चन्द्रगुप्तसकाश प्रेषितोऽस्मि । )

मलयकेतु—भद्र वाचिकमिदानी श्रोतुमिच्छामि ।

हिन्दी अनुवाद—भागुरायण—[ देखकर ] कुमार ! यह भी राक्षस की मुद्रा से अंकित ही है ।

मलयकेतु—यह पत्र का रिक्ततापूरक ( उपहार ) होगा । इस मुद्रा को भी बचाते हुए खोलकर दिखाओ ।

भागुरायण—[ वैसा करके दिखाता है । ]

मलयकेतु—[ देखकर ] अरे ! यह तो वह आभूषण है, जिसे मैंने अपने शरीर से उतार कर राक्षस के लिए भेजा था । स्पष्टतः, यह चन्द्रगुप्त के लिए पत्र है ।

भागुरायण—कुमार ! अभी संदेह का निर्णय कर लिया जाता है । भद्र ! फिर पीटो ( इसे ) ।

पुरुष—आर्य की जैसी आज्ञा । [ निकलकर और पुनः प्रवेश करके ] आर्य ! पीटने पर इसने कहा—कुमार को स्वयं ही बताऊँगा ।

मलयकेतु—प्रवेश कराओ ।

पुरुष—कुमार की जैसी आज्ञा ।

[ निकलकर सिद्धार्थक के साथ पुनः प्रवेश करता है । ]

सिद्धार्थक—[ पैरों पर गिरकर ] कुमार मुझे अभयदान देने की कृपा करे ।

मलयकेतु—भद्र ! भद्र !! पराधीन मनुष्य के लिए अभय ही है, इसलिए जैसा है, वैसा बताओ ।

सिद्धार्थक—कुमार सुने, अमात्य राक्षस ने मुझे यह लेख देकर चन्द्रगुप्त के पास भेजा है ।

मलयकेतु—भद्र ! अब मौखिक संदेश सुनना चाहता हूँ !