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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 382 of 488

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Page 382

पञ्चमोऽङ्कः २६६

सिद्धार्थकः— [ स्वगतम् ]

तिप्पन्तीए गुणेसुं दोसेसुं परंमुहं करन्तीए ।
अह्मारिसजणणीए प्पणमामो सामिभत्तीए ॥६॥
(तृप्यन्त्यै गुणेषु दोषेषु पराङ्मुखं कुर्वन्त्यै ।
अस्मादृशजनन्यै प्रणमामः स्वामिभक्त्यै ॥६॥)

अन्वयः— गुणेषु तृप्यन्त्यै दोषेषु पराङ्मुखं कुर्वन्त्यै अस्मादृशजनन्यै स्वामिभक्त्यै प्रणमामः ॥६॥

व्याख्या— गुणेषु—उत्कर्षेषु, तृप्यन्त्यै—सन्तुष्टायै, दोषेषु—अपराधेषु, पराङ्मुखं—विमुखं, कुर्वन्त्यै—विदधत्यै, अस्मादृशजनन्यै—अस्मादृशानां मद्विधानां जनन्यै ( अन्नदानादिपोषणकर्मभिः ) मातृरूपायै, स्वामिभक्त्यै—प्रभुसेवायै, प्रणमामः—नमस्कुर्मः ॥६॥

हिन्दी अनुवाद— इसलिए इस ( पर्वतेश्वर के वध के ) विषय में राक्षस को उलाहना नही देना चाहिए, प्रत्युत नन्द-राज्य के मिलने तक ( उस पर ) अनुग्रह करना चाहिए। बाद में स्वीकार करने में या परित्याग करने में कुमार प्रमाण हैं ( अर्थात् आपकी इच्छा है।)

मलयकेतु— ऐसा ही रहे। मित्र ! तुमने अच्छा सोचा है। अमात्य के वध करने पर प्रजा में विद्रोह उठ खड़ा होगा और इस प्रकार विजय संदिग्ध हो जाएगी।

पुरुष— [ प्रवेश करके ] कुमार की जय हो। ये आर्य के प्रधान शिविरपाल दीर्घचक्षु आर्य से निवेदन करते हैं—'बिना मुद्रा लिये एक लेख-पत्र के साथ शिविर से निकलते हुए इस पुरुष को हमने पकड़ा है, इसलिए आर्य इसको देखें।

भागुरायण— भद्र ! प्रवेश कराओ।

पुरुष— आर्य की जैसी आज्ञा। [ बाहर चला जाता है। ]

[ तदनन्तर बँधे हुए सिद्धार्थक और पीछे-पीछे एक पुरुष का प्रवेश ]

सिद्धार्थक— [ मन में ]

गुणों से संतुष्ट और दोषो से विमुख करने वाली हम लोगों की मातृतुल्य स्वामि-भक्ति को प्रणाम है ॥६॥