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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

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जैसा कि अन्य नाटकों में देखने को उपलब्ध होता है तो भी लक्ष्य की पूर्ति होना संभव न था। ऐसी स्थिति होने पर भरतवाक्य के तीसरे चरण में आये हुये "अधुना" शब्द की उपयोगिता भी पूर्ण न हो पाती। अतः इससे यही ध्वनित होता है कि नाटककार को "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" यही पाठ रखना अभीष्ट था।

इसके अतिरिक्त इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जहां लेखक ने अपने नाटक का इतिवृत्त मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाले चन्द्रगुप्त से सम्बन्धित रखा है वही लेखक द्वारा यह भी संकेत किया गया है कि उसके समय में राज्य करने वाले राजा का नाम भी चन्द्रगुप्त ही है। अतः "पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः" इस पाठ का संकेत गुप्तवंशीय राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय की ओर ही है।

इस आधार पर भी विशाखदत्त का स्थिति काल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध ही सिद्ध होता है क्योंकि चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्यकाल ३७५-४१३ ई० माना गया है।

डा० काशीप्रसाद जायसवाल ने भी भरतवाक्य के उपर्युक्त पाठ को ही प्रामाणिक माना है तथा भरतवाक्य मे आये हुये 'अधुना' और 'चन्द्रगुप्त' के आधार पर नाटक की रचना, चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के ही (३७५-४१४ ई०) काल की स्वीकार की है। उनकी प्रमुख युक्तियाँ निम्नलिखित हैं :—

(१) विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस मे जिस शैली का प्रयोग किया है वह शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की नही हो सकती है। नाटककार की शैली में लम्बे-लम्बे समासो का अभाव है। इसमे कृत्रिमता का भी दर्शन लगभग नगण्य के समान है। अतः इस प्रकार की शैली पंचम शताब्दी के पश्चात् की होना किसी भी दशा मे संभव नही है।

(२) नाटक की राजनीतिक कल्पनाएं भी चतुर्थ अथवा पंचम शताब्दी की परिस्थितियों की ही द्योतक हैं।

(३) 'भरतवाक्य' में जिस साम्राज्य की कल्पना की गई है—वह गुप्तकाल ही प्रतीत होता है।

(४) यदि विशाखदत्त बाण के समकालिक थे तो दोनो को एक-दूसरे का ज्ञान क्यो नहीं था।

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