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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 379

२६६ मुद्राराक्षसम्

( राज्य ) कार्य सौंप देने वाले और ( अतएव ) स्वस्थ चित्तवृत्ति वाले पिता ( पर्वतेश्वर ) को बन्धुजनों के आँसुओं के साथ धराशायी करके तुम अर्थ की दृष्टि से भी राक्षस हो ( अर्थात् केवल नाम्ना ही राक्षस नहीं हो अपितु कर्मणा भी राक्षस हो ) ॥७॥

टिप्पणी—अये श्रुतम् क्षपणक को यह नहीं मालूम था कि मलयकेतु उसकी बात सुन रहा है। इसलिए जब मलयकेतु ने कहा कि मैंने सब कुछ सुन लिया तब वह बहुत प्रसन्न हुआ और यह कह उठा कि मैं कृतकृत्य हो गया । क्योंकि वह इसी कार्य के लिए नियुक्त था कि मलयकेतु के मन में पर्वतेश्वर की हत्या राक्षस ने करवाई है चाणक्य ने नहीं—इस बात को जमा दे । सो वह इस कार्य में सफल हो गया । बन्धुजनाक्षितोयै —बन्धुजनानाम् अक्षितोयैः = नेत्रजलै । निपात्य—प्राणैर्वियोज्य इत्यर्थ । अन्वर्थत —अर्थ का अनुसरण करते हुए, यथार्थ मे । अनुगतं अर्थम् अन्वर्थ , तेन । 'तृतीयायास्तसि' इत्यनेन तसिप्रत्यय । इस पद्य में अतिशयोक्तिमूलक सहोक्ति अलंकार है । इसमे वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥७॥

भागुरायण —[ स्वगतम् ] रक्षणीया राक्षसस्य प्राणा इत्यार्यादेश । भवत्वेवं तावत् ! [ प्रकाशम् ] कुमार ! अलमावेगेन । आसनस्थं कुमारं किञ्चिद्विज्ञापयितुमिच्छामि ।

मलयकेतु —[ उपविश्य ] सखे ! किमसि वक्तुकाम ?

भागुरायण —कुमार ! खल्वर्थशास्त्रव्यवहारिणामर्थवशादरिमित्रोदासीनव्यवस्था न लौकिकानामिव स्वेच्छावशात् । यतस्तस्मिन् काले सर्वार्थसिद्धिं राजनमिच्छतो राक्षसस्य चन्द्रगुप्तादपि बलीयस्तया सुगृहीतनामा देव पर्वतेश्वर एवार्थपरिपन्थी महानरातिरासीत् । तस्मिंश्च काले राक्षसेनेदमनुष्ठितमिति नातिदोषमत्र पश्यामि । पश्यतु कुमार —

मित्राणि शत्रुत्वमिवानयन्ती
मित्रत्वमर्थस्य वशाच्च शत्रून् ।
नीतिर्नयत्यस्मृतपूर्ववृत्तं
जन्मान्तरं जीवत एव पुंसः ॥८॥