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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 375

२६२ मुद्राराक्षसम्

क्षपणक—उपासक ! यह (गोपनीय) नही है, तो भी अत्यन्त कठोर बात मैं नही कहूँगा।

भागुरायण—भदन्त ! मैं भी मुद्रा नहीं दूंगा।

क्षपणक—[ मन मे ] इस समय ( सुनाने के ) प्रार्थी को कहना उचित है। [ प्रकट ] क्या उपाय है ? अभी बताता हूँ, उपासक सुने । यह सत्य है कि पहले पाटलिपुत्र मे रहता हुआ भाग्यहीन मैं राक्षस का मित्र बन गया । उसी समय राक्षस ने गुप्त रूप से विषकन्या का प्रयोग करके महाराज पर्वतेश्वर को मरवा दिया ।

टिप्पणी—प्रणयकोप—प्रणयकृत कोप प्रणयकोपः मध्यमपदलोपी स०। अपराद्धम्—अप्‌√राध् ( दिवादि )+क्त भावे अथवा अप√राध्+क्त कर्मणि अपराद्धम् । प्रथम व्युत्पत्ति किम् को प्रश्नवाची मानकर की गई है और दूसरी व्युत्पत्ति किम् को ‘अपराद्धम्’ का विशेषण मानकर दिखाई गई है । भदन्तस्य—यहाँ ‘राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्न’ सूत्र से चतुर्थी होनी चाहिए थी, किन्तु शेष की विवक्षा मे षष्ठी हो गई । अतिनृशंसम्—अतिशयक्रूरम् । घातित पर्वतेश्वर—राक्षस ने पर्वतेश्वर का वध कराया है, यह अफवाह चाणक्य ने फैला दी थी, जो राक्षस को मालूम थी । किन्तु मलयकेतु के कानो तक नही पहुँची थी । अब जीवसिद्धि भागुरायण के द्वारा मलयकेतु को इससे अवगत करा देना चाहता है ।

मलयकेतु—[ सबाष्पमात्मगतम् ] कथं राक्षसेन घातितस्तातो न चाणक्येन ?

भागुरायण—भदन्त ! ततस्ततः ?

क्षपणक—तदो हगे रक्खसस्स मित्तं कदुअ चाणक्कहदएण सणि-काल णअरादो णिव्वासिदो । दाणीं पि रक्खसेण अणेअकज्जकुसलेण किंपि तादिस आलहीअदि, जेण हगे जीअलोआदो णिष्कासिज्जेमि ।

( ततोऽहं राक्षसस्य मित्रं कृत्वा चाणक्यहतकेन मणिकार नगराद्निर्वा-सित । इदानीमपि राक्षसेनानेकाकार्यकुशलेन किमपि तादृशमारभ्यते, येनाहं जीवलोकान्निष्कासिष्ये ।)