Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 359 of 488

Read in context
Page 359
२७६मुद्राराक्षसम्

अन्वय —क्षणम् आविर्भूतानुरागा एते उपवनतरव उदयगिरे उज्जिहानस्य भानो पुरस्तात् पत्रच्छायं आशु एव दूर गत्वा पुन अपरककुप्प्रान्तपर्यन्त-बिम्ब तस्मिन् निवृत्ता, प्राय सेवमाना भृत्या प्रचलितविभव स्वामिन त्यजंति ॥२२॥

व्याख्या—क्षणम्—क्षणकालम्, आविर्भूतानुरागा —आविर्भूत प्रकटितः अनुरागः प्रीति येषा तादृशा, एते—इमे, उपवनतरव —आरामवृक्षा, उदयगिरे —पूर्वपर्वतात्, उज्जिहानस्य—उद्गच्छन, भानो —सूर्यस्य, पुरस्तात् —पुर, पत्रच्छाय —पत्राच्छायारूपेण, आशु एव—शीघ्रमेव, दूर गत्वा—विप्रकृष्टस्थान प्राप्य, पुन —भूय, अपरककुप्प्रान्तपर्यस्तबिम्बे—अपरस्या इतरराया पश्चिमाया इति यावत् ककुभ दिश प्रान्ते सीमनि पर्यन्तम् अवलम्बित बिम्ब मण्डल यस्य तादृशे, तस्मिन्—भानौ, निवृत्ता —परावृत्ता, प्राय —बाहुल्येन, सेवमाना —उपचरन्त, भृत्या —सेवका प्रचलितविभव—प्रचलितः विच्युत विभव प्रभुत्व यस्य तादृश, स्वामिन—प्रभु, त्यजंति—जहति ॥२२॥

हिन्दी अनुवाद—राक्षस—भदन्त ! दूसरे ज्योतिषियों के साथ परामर्श
र लीजिए ।

क्षपणक—उपासक ( अर्थात् आप ) परामर्श करे । मैं अपने घर जाऊँगा ।

राक्षस—भदन्त क्रुद्ध तो नही हो गए ?

क्षपणक—आपका भदन्त क्रुद्ध नही हुआ है ।

राक्षस—तब कौन ( क्रुद्ध हुआ है ) ?

क्षपणक—भगवान् काल । जिससे आप अपने पक्ष को ( अर्थात् मुझे ) छोड़कर दूसरे पक्ष को ( अर्थात् दूसरे ज्योतिषियों को ) प्रमाणित कर रहे हैं ।

[ क्षपणक चला जाता है । ]

राक्षस—प्रियवदक ! देखो तो क्या समय है ।

प्रियवदक—जो अमात्य की आज्ञा । [ बाहर जाकर और पुनः प्रवेश करके ] भगवान् सूर्य अस्त होने के इच्छुक हैं । ( पक्षान्तर में श्रीमान् राक्षस अर्थ ( मौर्य के अमात्यपद ) के अभिलाषी हैं । )