मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in contextचतुर्थोऽङ्कः २७३
उत्थान के साथ ही पतन होने पर चाणक्य के सम्पर्क में जाना उचित है ॥१९॥
टिप्पणी—भदन्त !—मान्य ! बौद्ध संन्यासी के लिए यह सम्बोधन है । √ भन्द् ( कल्याणे ) + झच् कर्तरि औणादिक, भस्य अन्तादेशः । अथवा भदन्त ज्योतिषी को कहते हैं । भानि नक्षत्राणि दन्ताः अस्य इति भदन्तः । निरूप्यताम्—निश्चीयताम् । सावका !—इसका संस्कृत पाठभेद 'श्रावकाः' भी है । शृण्वन्ति इति श्रावकाः = श्रोतारः √ श्रु + ण्वुल् कर्तरि । आ मध्याह्नात्—दिनमध्यात् आरभ्य । निवृत्तसप्तशकला—निवृत्तं व्यतीतं सप्तशकलं विष्टिभद्रात्मकः सप्तमतिथ्यंशः यस्याः सा निवृत्तसप्तशकला । तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं । करणों की संख्या ११ है । जिनमें से सात चर संज्ञा वाले करण ये हैं—'वव, वालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज् और विष्टिभद्रा' । यहाँ 'निवृत्तसर्वकल्याणा' यह पाठभेद भी मिलता है । इसका अर्थ है—सब प्रकार के कल्याणों से शून्य । इस पाठभेद में वाक्य की संगति बैठाने के लिए खीचातानी करनी पड़ेगी । पौर्णमासी—पूर्णो मासः पूर्णमासः । तस्य इयम् इति पौर्णमासी पूर्णमास + अण्—ङीप् । उत्तरस्याः—अत्र अपादाने पञ्चमी । दक्षिणद्वारिकम्—याम्यदिग्वर्ति । यहाँ कवि का तात्पर्य मृगशिरा नक्षत्र से है । यात्रा में इतने नक्षत्र उत्तम माने गए हैं—'अश्विनी रेवती ज्येष्ठा पुष्यो हस्तः पुनर्वसुः । मैत्रो मृगशिरो मूलं यात्रायां चोत्तमाः स्मृताः ॥' उदितास्तमिते केतौ—राहु और केतु का एक ही शरीर है, जो सर्पाकार है । सिर भाग को राहु कहा जाता है और पुच्छ भाग को केतु । सिर के उदित होने पर पुच्छ अस्त हो जाता है और पुच्छ के उदित होने पर सिर अस्त हो जाता है । इसीलिए 'उदितास्तमिते' कहा है । इस पद्य में श्लेषालंकार है और आर्या छन्द है ॥१९॥
राक्षसः—भदन्त ! तिथिरेव तावन्न शुध्यति ।
क्षपणकः—सावका ! ( उपासक ! )–
एक्कगुणा होइ तिही चउग्गुणे होइ णक्खत्ते ।
चउसत्तिगुणे लग्गे एसे जोइसतन्तसिद्धं ते ॥२०॥
( एकगुणा भवति तिथिश्चतुर्गुणं भवति नक्षत्रम् ।
चतुः षष्टिगुणं लग्नमेतद्दृश्यते ज्योतिषतन्त्रसिद्धान्ते ॥२०॥ )
मु० रा०—१८