मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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(२) दूसरी आपत्ति यह है कि मुद्राराक्षस के लेखक विशाखदत्त ने कश्मीर-नरेश पुष्कराक्ष को 'म्लेच्छ' इस घृणित नाम से अभिहित किया है। यहाँ यह विचारणीय है कि यदि लेखक के आश्रयदाता कश्मीर-नरेश रहे होते तो क्या वह अपने आश्रयदाता को 'म्लेच्छ' शब्द द्वारा कहता ? अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त कश्मीर-नरेश के आश्रय में नहीं रहे।
(३) तीसरी बात यह है कि प्रस्तावना मे जिस चन्द्रग्रहण का उल्लेख आया है वह वस्तुतः सत्य न होकर चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रसङ्ग की अवतारणा के साथ ही रंगमंच पर लाने का प्रयास मात्र ही है। इसके अतिरिक्त वराहमिहिर द्वारा रचित वृहत्संहिता मे बुध के योग से पूर्ण चन्द्रग्रहण के होने मे विप्रतिपत्ति दिखलाई गई है। उन्होंने इसका प्रबल खण्डन किया है। अतः इस आधार पर विशाखदत्त का समय वराहमिहिर (लगभग ४९० ई०) से पूर्व ही होना चाहिये। इस दृष्टि से चन्द्रग्रहण के आधार पर निर्मित विचार निराधार ही हो जाता है।
(४) इसके अतिरिक्त श्रीतैलङ्ग महोदय ने कश्मीर-नरेश अवन्तिवर्मा को इस आधार पर विशाखदत्त का आश्रयदाता नहीं स्वीकार किया है कि उनको जिन स्थानो से मुद्राराक्षस की दो पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुयी है उन स्थानों से यह कश्मीर अधिक दूरी पर स्थित है।
अब इस पाठ के अन्तर्गत मौखरिवंशीय अवन्तिवर्मा की बात आती है। तैलङ्ग महोदय इसी को प्रामाणिक मानते हैं। उनके मतानुसार ये 'अवन्तिवर्मा' राजा हर्षवर्धन (जिनका कार्यकाल ऐतिहासिकों के मतानुसार ६०६-६४८ ई० माना गया है।) के बहनोई ग्रहवर्मा के पिता मौखरि राजा अवन्तिवर्मा थे। ये कन्नौज निवासी थे। कन्नौज के राजा के सामन्त का बिहार अथवा पश्चिमी बंगाल में भी होना संभव माना जा सकता है। प्रोफेसर श्री ध्रुव का भी इस सम्बन्ध मे यही मत है कि :—
'मिहिरकुल' तथा 'तोरमाण' द्वारा स्थापित हूण-साम्राज्य दशपुर (आजकल इसे मंदसौर कहा जाता है।) के संग्राम में महाराज यशोवर्मा के हाथों सन् ५२८ ई० में नष्ट हुआ तथा छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया; जिसके अन्तर्गत पंजाब में 'शाकल' (आधुनिक स्यालकोट) राज्य, और पश्चिमी राजपूताना