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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 315 of 488

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Page 315

२३० मुद्रा राक्षस म्

व्याख्या—आर्याज्ञया एव—आर्यस्य पूज्यस्य चाणक्यस्य आज्ञया एव आदेशेनेव, लङ्घितगौरवम्—लङ्घितम् अतिक्रान्तम् गौरवम् प्रतिष्ठा येन तादृशस्य, मम—मे, अवने—पृथिव्या , विवरम्—रन्ध्र, प्रवेष्टुम्—अन्तर्गन्तुम्, बुद्धि—मति , प्रवृत्ता—उद्यता । ये—जना , सत्यमेव—यथार्थमेव, गुरून्—पूज्यान्, न प्रतिमानयन्ति—न सत्कुर्वन्ति, तेषा—जनाना, हृदय—चित्त, लज्जा—त्रपा, कथ नु—कस्मात् न, भिनत्ति—विदारयति ? ॥ ३३ ॥

हिन्दी अनुवाद—राजा—आर्य ! क्या सोच रह हो ?

कञ्चुकी—महाराज ! कुछ नहीं सोच रहा हूँ, किन्तु यह निवेदन करता हूँ कि भाग्य से महाराज अब महाराज हो गए।

राजा—[ मन में ] इस प्रकार हमारे समझे जान पर ( अर्थात् जब लोग मेरे और चाणक्य के लीलाकहह को यथार्थ समझने लगे तब) अपने कार्य की सिद्धि चाहने वाले आर्य पूरणकाम हो। [ प्रकट ] शोणोत्तरे ! इस मूर्ख विवाद से सिर की वेदना मुझे पीडित कर रही है । इसलिए शयनकक्ष में ले चलो।

प्रतीहारी—आव महाराज ! आवें ।

राजा—[ आसन से उठकर मन में ] आर्य ( चाणक्य ) की आज्ञा से ही मर्यादा का अतिक्रमण करने वाली मेरी बुद्धि पृथ्वी के बिल में बैठने को तैयार हो गई है। जो यथार्थ में ही गुरुओ का सत्कार नहीं करते हैं, उनके हृदय को लज्जा क्यों नहीं विदीर्ण कर देती है ? ॥ ३३ ॥

[सभी (पात्र) बाहर चले जाते हैं ।]

॥ तीसरा अंक समाप्त ॥

टिप्पणी—गृह्यमाणेषु—प्रतीयमानेषु । स्वकार्यसिद्धिकाम—स्वस्य कार्यं, तस्य सिद्धि , तां कामयत तादृश । सकाम—सिद्धमनोरथ । शुष्ककलहेन—शुष्क कलह कर्मधारय स०, तेन, हेतौ तृतीया । शिरोवेदना—मस्तकपीडा । प्रतिमानयन्ति - पूजयान्त । प्रति $\sqrt{}$ मान् ( पूजायाम् ) + णिच् + लट्—अन्ति । इस श्लोक के प्रथम चरण में परिसंख्या अलंकार पदार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार से संसृष्ट है । दूसरे चरण में पदार्थहेतुक काव्यलिंग