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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 304 of 488

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Page 304

तृतीयोऽङ्कः । २१७

राजा—इस विषय में तो ऐसा- (कहना ठीक) है। किन्तु राक्षस यही नगर के भीतर रहता हुआ आपके द्वारा उपेक्षित कर दिया गया, इस विषय में आपका क्या उत्तर है।

चाणक्य—राक्षस भी अपने स्वामी (नन्द) मे दृढ़ अनुराग रखने के कारण और चिरकाल तक एक जगह निवास करने के कारण शील को पहचानने वाली तथा नन्द के प्रति अनुरक्त प्रजाओं का अत्यन्त विश्वसनीय, बुद्धि और पराक्रम से सम्पन्न, सहायको की सम्पदा से युक्त और कोश-बल से संवलित होकर यही नगर के भीतर रहता हुआ महान् आन्तरिक विद्रोह को उत्पन्न कर देता। किन्तु दूर कर दिये जाने पर बाह्य विद्रोह को उत्पन्न करता हुआ भी कठिनाई से वश में करने योग्य नही होगा (अर्थात् आसानी से वश में किया जा सकेगा), इसलिए भागता हुआ उपेक्षित किया गया।

राजा—तब यही रहता हुआ (वह) क्यो नही उपायो से वश में कर लिया गया ?

चाणक्य—अब वह कैसे निकला हुआ रह सकेगा ? अरे ! उपायो से ही तो वह हृदय मे विद्यमान कांटे के समान निकालकर दूर कर दिया गया।

राजा—आर्य ! पराक्रम करके (अर्थात् शक्तिप्रयोग द्वारा), क्यो नही पकड़ लिया ?

चाणक्य—वह राक्षस शक्तिप्रयोग द्वारा पकड़ा जाता हुआ या तो स्वयं नष्ट हो जाता या तुम्हारी सेनाओं को विनष्ट कर देता। ऐसा होने पर दोनो प्रकार से हानि होती। देखो—

टिप्पणी—विश्रब्धम्—विश्वस्त यथा स्यात् तथा। क्रियाविशेषणमेतत्। आख्येयम्—वक्तव्यम्। अपक्रामन्—अपसरन्। उपेक्षितः—परित्यक्तः। अपक्रमणानुपक्षणे—न उपेक्षाम् अनुपेक्षाम्। अपक्रमणस्य अनुपेक्षाम् अपक्रमणानुपक्षणम्, तस्मिन्। द्वयी गतिः—द्वौ पक्षौ। द्वौ अवयवौ यस्याः सा द्वयी अथवा द्वितयी द्वि+तयप्, 'द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा' इत्यनेन अयजादेशस्य विकल्पात्। प्रतिपाद्येत—दीयेत। व्यापादितः—विनाशितः। कृतघ्नतायाः—विश्रम्भघातितयाः। कृतं हन्तीति कृतघ्नः कृत√हन्+क, तस्य भावः कृतघ्नता कृतघ्न+तल्—टाप्, तस्याः। स्वयम्—आत्मना। हस्तः—