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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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२१४ मुद्राराक्षसम्

बलेन—म्लेच्छसैन्येन, परिवृत —युक्त, पितृवधामर्षी—तातहत्याजन्यक्रोधयुक्त, पर्वतकपुत्र , मलयकेतु , अस्मान्, अभियोक्तुम्—पराभवितुम्, उद्यत —तत्पर सोऽय, व्यायामकाल —व्यायामस्य सैन्यमग्रहाद्यात्मकस्य विशिष्टायासम्य काल समय , न—नहि, उत्सवकाल —कौमुदीमहोत्सवसमय ( अस्ति ) । अत —अस्मात् कारणात्, दुर्गमद्वारे—दुर्गपरिष्कारे, आरब्धव्ये—प्रक्रमिंतव्ये, किम्—किम्प्रयोजन, कौमुदीमहोत्सवेन—शारदपूर्णचन्द्रनिमित्तोत्सवानुष्ठानेनेत्यर्थः ?, इति—अस्माद्धेतो , प्रतिषिद्ध —प्रतिरुद्ध उक्तोत्सव इति शेष ।

हिन्दी अनुवाद—राजा—आर्य ! इस प्रकार इनकी विरक्ति के कारणों का पता लग जाने पर आपने शीघ्र ही प्रतीकार क्यो नही किया ?

चाणक्य—वृषल ! प्रतीकार न कर पाया ।

राजा—क्या असमर्थता के कारण या प्रयोजन की अपेक्षा से ।

चाणक्य—असमर्थता क्यो होगी ? प्रयोजन की अपेक्षा से ही ।

राजा—तो अब प्रतीकार न करने का प्रयोजन सुनना चाहता हूँ।

चाणक्य—वृषल ! सुनो और विचार करो ।

राजा—दोनो कर रहा हूँ, कहिए ।

चाणक्य—वृषल ! इस संसार में विरक्त प्रजाओ का प्रतीकार दो प्रकार से किया जाता है—अनुग्रह से और निग्रह से । अनुग्रह तो पदच्युत किये गये भद्रभट और पुरुषदत्त को पुन पदारूढ करना ही है । और व्यसन के कारण वैसे अयोग्य व्यक्तियो को पुन पदारूढ करना सम्पूर्ण राज्य की जड—हस्तिसेना और अश्वसेना को विनष्ट कर देना होता । अत्यन्त लोभी स्वभाव वाले तथा सम्पूर्ण राज्य दे देने पर भी सन्तुष्ट न होने वाले हिङ्गुल रात और बलगुप्त पर कैसे अनुग्रह किया जा सकता है ? धन के नाश से डरे हुए राजसेन और भागुरायण पर अनुग्रह करने का अवसर कहाँ ? दायादो को सहन न करने वाले अत्यन्त अभिमानी लोहिताक्ष और विजयवर्मा को भी कैसा अनुग्रह सन्तुष्ट करेगा ? इसलिए पूर्व पक्ष (अनुग्रह) को छोड दिया । दूसरा पक्ष (निग्रह) भी अभी-अभी नन्द का ऐश्वर्य प्राप्त करने वाले हम साथ उठने (-बैठने) वाले प्रधान राजपुरुषो को तीक्ष्ण दण्ड के द्वारा पीडित करने पर नन्द-वश के प्रति अनुरक्त प्रजाओ के अविश्वासी हो जाएँगे—इस विचार से छोड ही दिया गया । तो इस प्रकार