मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
Page 261 of 488
Read in context१७४ | मुद्राराक्षसम्
व्याख्या—शनैः—क्रमेण, शान्ता—निर्मला, भूता—जाता, सितजलधरच्छेदपुलिना—सिता धवला जलधरच्छेदा मेघखण्डा पुलिनानि इव सैकतानि इव सन्ति यासां ताः, कलविरुतिभिः—अव्यक्तमधुरशब्दैः, सारसकुलैः—क्रौञ्चपङ्क्तिभिः, समन्तात्—सर्वतः, आकीर्णाः—व्याप्ताः, दश, दिशः—आशाः, निशि—रात्रौ, चित्राकारे—अनेकविधे, विकचनक्षत्रकुमुद—निकचे विकसितैः कुमुदसदृशैः नक्षत्रैः, चिता—व्याप्ता, (सत्यः) दीर्घा—आयता, सरित इव—नद्य इव, नभस्तः—आकाशात्, स्यन्दन्ते—प्रसरन्ति ॥ ७ ॥
हिन्दी अनुवाद—[ प्रकट ] आर्य वैहीनरे ! सुगाङ्ग भवन का मार्ग बताओ ।
कञ्चुकी—इधर से महाराज ( आवें ) इधर से ।
राजा—[ घूमता है । ]
कञ्चुकी—[ घूमकर ] यह सुगाङ्ग भवन है । धीरे-धीरे आप चढ़ें ।
राजा—[ अभिनय के साथ चढ़कर और दिशाओं को देखकर ] अहा ! शरत्काल में बढ़ी हुई शोभा की विभूतियों से सम्पन्न दिशाओं की अतिशय सुन्दरता है । क्योंकि—
क्रमशः निर्मल बनी हुई, रेतीले किनारे के समान शुभ्र मेघ-खण्डों से युक्त, अव्यक्त मधुर शब्द करने वाले क्रौञ्च पक्षियों के समूहों से, सभी ओर से व्याप्त और अनेक प्रकार के विकसित कुमुदों के समान नक्षत्रों से युक्त दसों दिशायें लम्बी नदियों के समान आकाश से प्रवाहित हो रही हैं ॥ ७ ॥
टिप्पणी—वैहीनरे—यह कञ्चुकी का नाम है । विहीनो नरः कामभोगाभ्याम् इति विहोनरः पृषोदरादित्वात् नलोपः । विहीनोरस्य अपत्यं वैहीनरिः विहीनूर + इञ्, तत्सम्बुद्धौ हे वैहीनरे इति । शरत्समयसम्भृतशोभाविभूतीनाम्—शरद् समय के कारण बढ़ी हुई शोभा के ऐश्वर्य से सम्पन्न । शरदव समयः, तेन सम्भृता उपचिता, तादृशी शोभा विभूतिर्यासां ताः ॰ शोभाविभूतयः तासाम् । किसी पुस्तक में 'शान्ता भूता' के स्थान में 'श्यानीभूता' पाठ मिलती है । उसकी व्याख्या होगी—'श्यानीभूता' । √श्यै + क्त कर्तरि = श्याना 'संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः' इति सूत्रेण तस्य न । अश्याना श्याना भूता इति