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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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१६० मुद्राराक्षसम्

शङ्का भी करती है (अर्थात् जैसे राजा और मन्त्री में फूट है उसी तरह प्रजाओं में भी है)।

राक्षस — मित्र ! वहाँ (राजा और मन्त्री में फूट पड़ने का) क्या कारण है ?

**विराधगुप्त—**अमात्य ! वहाँ यह कारण है कि मलयकेतु के निकल भागने के बाद से लेकर चन्द्रगुप्त के द्वारा चाणक्य तंग किया जा रहा है और चाणक्य भी विजय के अभिमान में चूर होने के कारण (चन्द्रगुप्त को) सहन न करता हुआ उन-उन आज्ञाओं के उल्लंघनों से चन्द्रगुप्त के हृदय में पीड़ा उत्पन्न करता है, ऐसा ही मेरा अनुभव है।

राक्षस — [हर्ष के साथ] मित्र विराधगुप्त ! तब तो तुम इसी सँपेरे के बहाने फिर कुसुमपुर ही जाओ। वहाँ स्तनकलश नाम का मेरा मित्र वैतालिक के वेष में रहता है। उसे तुम मेरी ओर से कहना कि चाणक्य के द्वारा आज्ञाओं के उल्लंघन किये जाने पर तुम्हें अत्यन्त उत्तेजित करने में समर्थ श्लोकों से चन्द्रगुप्त की स्तुति करनी चाहिए और कार्य का बहुत ही गुप्त रूप से करभक के द्वारा (मुझे) कहना भेजना चाहिए।

विराधगुप्त — अमात्य की जो आज्ञा।

[बाहर चला जाता है।]

**टिप्पणी—अपि—**यहाँ प्रश्नवाचक अव्यय है। **अस्मदुपजापम्—**अस्माकम् उपजापम् = भेदमन्त्रम्। **बाढम्—**यह स्वीकारार्थक अव्यय है। **जितकाशितया—**जितेन जयेन काशते स्पर्धत इति जितकाशी, तस्य भावः जितकाशिता, तया अतिगर्वितयेत्यर्थः। **अनुभवः—**अनुभूयत इति अनु√भू+अप् कर्मणि। **वैतालिकव्यञ्जनः—**स्तुतिपाठकस्य मागधस्य लिङ्गधारीत्यर्थः। **समुत्तेजनसमर्थैः—**समुद्दीपनयोग्यैः। सम्-उद्√तिज्+णिच्+ल्युट्—अन=समुत्तेजनम्। तत्र समर्थाः सुप्सुपा स०, तैः। **उपश्लोकयितव्यः—**स्तोतव्यः। उप√श्लोक्+णिच्+तव्य कर्मणि।

पुरुष — [प्रविश्य] जेदु अमच्चो। अमच्च ! सअडदासो विष्णवेदि, एदे क्खु तिणि अलङ्कारविसेसा विक्कीअन्ति, ता पच्चक्खीकरेदु अमच्चो। (जयत्वमात्य। अमात्य ! शकटदासो विज्ञापयति, एते खलु