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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 245 of 488

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Page 245

१५६ मुद्राराक्षसम्

सिद्धार्थक—अमच्च ! अत्थि कुसुमपुरणिवासी मणिआरसेट्ठी चन्दन-
दासो णाम। तस्स गेहदुवारे भूमिए पडिदा, मए समासाहिदा।
(अमात्य ! अस्ति कुसुमपुरनिवासी मणिकारश्रेष्ठी चन्दनदासो नाम।
तस्य गेहद्वारे भूमौ पतिता, मया समासादिता।)

राक्षस—युज्यते।

सिद्धार्थक—अमच्च ! किं एत्थ जुज्जदि ? (अमात्य ! किमत्र
युज्यते ?)

राक्षस—भद्र ! यतो महाधनानां गृहे पतितस्यैवंविधस्योपलब्धि-
रिति।

शकटदास—सखे सिद्धार्थक ! अमात्यनामाङ्कितेयं मुद्रा। तदितो
बहुतरेणार्थेन भवन्तममात्यस्तोषयिष्यति। तद् दीयतामेषा मुद्रा।

सिद्धार्थक—अज्ज ! एसो मे परितोसो, जं अमच्चो इमाए मुद्धाए
परिग्गहप्पसादं करेदित्ति। (आर्य ! एष मे परितोषो, यदमात्योऽस्या
मुद्रायाः परिग्रहप्रसादं करोतीति।) [ इति मुद्रां समर्पयति ]

हिन्दी अनुवाद—राक्षस—भद्र ! हो, इसमें क्या हानि है ? शकटदास !
ऐसा कर दो।

शकटदास—जो आज्ञा। [ मुद्रा को देखकर धीरे से कान में ] अमात्य !
इस मुद्रा पर तो आपका नाम अङ्कित है।

राक्षस—[ देखकर विषाद और सन्देह के साथ मन में ] सचमुच,
नगर से बाहर निकलते हुए मेरे हाथ से ब्राह्मणी ने सान्त्वना के लिए (यह
मुद्रा) ले ली थी। तो इसके हाथ में कैसे आ गई ? [प्रकट] सौम्य सिद्धार्थक !
तुम्हें यह कहाँ मिली ?

सिद्धार्थक—अमात्य ! पाटलिपुत्र में चन्दनदास नाम का सेठ जौहरी रहता
है। उसके गृह-द्वार की भूमि पर गिरी-पड़ी मैंने पायी।

राक्षस—ठीक है।

सिद्धार्थक—अमात्य ! इसमें ठीक क्या है ?