मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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राम, कृष्ण आदि की लीलायें करने का उद्देश्य श्रद्धा प्रकट करना नहीं है वरन् उनके चरित्र का स्मरण तथा श्रवण कर तदनुकूल अपने जीवन का निर्माण करना ही है। साथ ही राम एवं कृष्ण की स्मृति को स्थायित्व प्रदान करना भी है।
(३) मे पोलवाद— उपर्युक्त वाद में पाश्चात्य विद्वानों को भी विश्वास न हो सका अतः उन्होंने नाटकों का उद्भव मे-पोल-नृत्य से स्वीकार किया। पाश्चात्य देशों में मई मास महान् उल्लास एवं हर्ष का मास माना जाता है। इसमे लोग अत्यन्त प्रसन्नता एवं उल्लास के साथ उत्सव मनाते हैं, नृत्य करते हैं तथा पूर्ण आनन्द का अनुभव किया करते हैं। इतना ही नहीं, वे लोग एक लम्बा बाँस गाड़कर उसके नीचे एकत्रित होते तथा सभी स्त्री-पुरुष मिलकर नृत्य किया करते हैं। इस देश में भी 'इन्द्रध्वज' नामक पर्व लगभग इसी रूप में मनाया जाया करता था!
प्राय सभी देशों में वसन्त ऋतु का उत्सव अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मे-पोल का उत्सव भी इसी ऋतु में हुआ करता है किन्तु 'इन्द्रध्वज' सम्बन्धी उत्सव तो भारत में वर्षा ऋतु में मनाया जाता है। अतः मे-पोल उत्सव के साथ इसका सम्बन्ध जोड़ना पूर्णतया अनुचित ही प्रतीत होता है।
(४) कृष्णोपासनावाद— इस वाद के अनुसार नाटकों का उद्भव केवल कृष्ण की उपासना से ही माना गया है। इसमें सन्देह नहीं कि कृष्णो-पासना से सम्बन्धित रथयात्रायें, नृत्य, वाद्य, गीत तथा लीलायें आदि कृष्णो-पासना के अंगो (साधनों) का नाटकों के अभिनय इत्यादि से घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा ये इस प्रकार के साधन हैं कि जो सम्पूर्ण नाटकों के निर्माण में सहायक भी सिद्ध हुये हैं। अतः इसी आधार पर सम्पूर्ण नाटकों का विकास कृष्णोपासना से माना गया है।
किन्तु इस वाद में सबसे बड़ा दोष यह है कि कृष्ण-सम्बन्धी नाटक ही सर्वाधिक प्राचीन हों, इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। इसके अतिरिक्त यह भी सम्भव हो सकता है कि राम, शिव आदि देवों की उपासनाओं द्वारा भी भारतीय नाटकों के विकास में सहयोग प्राप्त हुआ हो, किन्तु इस बात की उपर्युक्त बातों में पूर्णतया उपेक्षा की गई।