मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context३१२ मुद्राराक्षसम्
योग में 'तम्' में द्वितीया हुई। जयाय—अत्र 'तुमर्थाच्च भाववचनात्' इति सूत्रेण चतुर्थी। इन श्लोक में 'जग' से 'चाणक्यनीति' की, 'लोभ' से 'राक्षस' की, 'काम' से 'नन्द' की, 'नगर' से 'मौर्य' की और 'धर्म' से 'चन्द्रगुप्त' की तुलना की गई है। 'उपचीयमानम्' का सम्बन्ध 'धर्म' और चन्द्रगुप्त दोनो से है। इसमें उपमा और समासोक्ति अलंकार है। यहाँ वैदर्भी रीति, प्रसाद गुण और शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ ६ ॥
[ दृष्ट्वा ] अयममात्यराक्षसः। [ परिक्रम्योपसृत्य च ] इदममात्य-राक्षसस्य गृहम्। प्रविशामि। [ प्रविश्यावलोक्य च ] अमात्य ! स्वस्ति भवते।
राक्षस —आर्य जाजले ! अभिवादये। प्रियवदक ! आसनम् अत्र-भवत उपनय।
पुरुष —एद आसणम्। उपविसदु अज्जो। (इदमासनम्। उपविश-त्वार्यः।)
कञ्चुकी—[ उपविश्य ] अमात्य ! कुमारो मलयकेतुरमात्य विज्ञा-पयति—'चिरात्प्रभृत्यार्यं परित्यक्तोचितशरीरसंस्कार इति पीड्यते मे हृदयम्। यद्यपि मह्मा स्वामिगुण न शक्यन्ते विस्मर्तुं तथापि मद्वि-ज्ञापना मानयितुमहंत्यार्य [ इत्याभरणानि प्रदर्श्य ] अमात्य ! इमान्या-भरणानि कुमारेण स्वशरीगदवतार्य प्रेषितानि, धारयितुमहंत्यार्यः।
राक्षस —आर्य ! जाजले ! विज्ञाप्यता मद्वचनात् कुमारः। 'विस्मृता मया स्वामिगुणा भवद्गुणपक्षपातेन। किन्तु—
हिन्दी अनुवाद—[ देखकर ] यह तो मन्त्री राक्षस है। [ घूमकर और समीप जाकर ] यह अमात्य राक्षस का घर है। प्रवेश करता हूँ। [ प्रवेश करके और देखकर ] आपका कल्याण हो।
राक्षस—आर्य जाजले ! अभिवादन करता हूँ। प्रियवदक ! पूज्य (जाजलि) के लिए आसन लाओ।
पुरुष—यह आसन है आर्य बैठें।
कञ्चुकी—[ बैठकर ] अमात्य ! कुमार मलयकेतु अमात्य से निवेदन कर रहे हैं कि आर्य ने बहुत दिनों से शरीरोचित संस्कार (साज-सज्जा)