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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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मुद्राराक्षसम्

येन स एतादृश , जितकाशी—जितेन जयेन काशते उल्लमति इति जितकाशी जयोद्धत इत्यर्थ , राजसेवक —नृपपरिचारक , एते, त्रय , अवश्य—निश्चित, विनाश—मृत्युम्, अनुभवन्ति—प्राप्नुवन्ति । कथ—केन प्रकारेण, एष —आकाशस्थित , पुरुषै , दृष्टमात्र —अवलोकित , सन्नेव, अतिक्रान्त —अन्तर्हित । एतेषु—दृश्य-मानेषु, पुटनसमुद्गकेषु—मञ्जूषामम्पुटेपु, कि वस्तु विद्यते । जीविकाया —वृत्ते , सम्पादका —साधका , सर्पा —भुजङ्गमा । प्रेक्षितुम्—द्रष्टुम्, इच्छामि—अभिलषामि । प्रसीदतु—प्रसन्नो भवतु । एतत्—प्रेक्षणमित्यर्थ , अस्थानम्—अयुक्तम् । तत्—तस्मात् , यदि—चेत् , कौतूहल—कौतुक ( विद्यत ), एहि—आगच्छ, एतस्मिन्—अस्मिन्, आवासे—गृहे, दर्शयामि—अवलोकयामि । इदम्, भर्तु —स्वामिन , अमात्यराक्षसस्य, गृहम्—भवनम् । अस्मद्विधानाम्-मद्विधानाम् इह—अस्मिन् गृहे , प्रवेश —आगम , नास्ति—न विद्यते । तेन हि—अतएव, आर्य , गच्छतु—व्रजतु। जीविकाया ,प्रसादेन—उपायेन, इह, मम, प्रवेश , अस्ति। कथ—कृत , एषोऽपि—अयमपि, अतिक्रान्त —अन्तर्हित ।

हिंदी अनुवाद—[ आकाश में ] आर्य ! क्या कहते हो कि तुम कौन हो । आर्य ! मैं जीर्णविष नाम का सँपेरा हूँ । [ फिर आकाश में ] क्या कहते हो कि मैं भी साँप से खेलना चाहता हूँ । अच्छा, कौन जीविका आप अपनाये हुए हैं ? [ फिर आकाश में ] क्या कहते हो कि मैं राजकुल का सेवक हूँ । तब तो आप साँप से खेल ही रहे हैं । कैसे ? मन्त्र और ओषधियां ( के प्रयोग ) में अनाड़ी सँपेरा, मतवाले हाथी पर चढ़ने वाला ( व्यक्ति ) और अधिकार पाकर घमण्ड में चूर रहने वाला राजकर्मचारी—ये तीनों अवश्य ही विनाश को प्राप्त होते हैं । कैसे यह देखते ही चला गया ? [ फिर आकाश में ] आर्य ! क्या कहते हो कि इन ढकी हुई पिटारियों में क्या है । आर्य ! जीविका को चलाने वाले सर्प हैं । [ फिर आकाश में ] क्या कहते हो कि मैं देखना चाहता हूँ । आप प्रसन्न हों । यह उपयुक्त स्थान नहीं है । इसलिये यदि उत्सुकता हो तो आओ, इस घर में दिखाता हूँ । [ फिर आकाश में ] क्या कहते हो कि यह स्वामी अमात्य राक्षस का घर है। हम जैसों का यहाँ प्रवेश नहीं ( हो सकता ) है । तो आप जाइए । जीविका की कृपा से मेरा प्रवेश यहाँ ( हो सकता ) है । कैसे यह भी खिसक गया ?

टिप्पणी—आकाशे—इसे आकाशभाषित कहते हैं । आकाशभाषित का लक्षण यह है—

'किं ब्रवीषीति यन्नाट्ये विना पात्र प्रयुज्यते ।
श्रुत्वेवानुक्तमप्यर्थं तस्यादाकाशभाषितम् ॥

अथवा

'अप्रविष्टै सहासापो भवेदाकाशभाषणम् ।'