मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
Page 19 of 488
Read in context( १४ )
क्रिया-कलाप मे अभिनय-सम्बन्धी अंश विद्यमान है ही। अथर्ववेद मे भी प्रायः सभी प्रकार के रसो का वर्णन प्राप्त होता है।
उपर्युक्त अति सूक्ष्म विवरण के आधार पर यह मान लेना कि वेदो मे ही नाटकों का उद्भव हुआ है, उचित ही प्रतीत होता है।
किन्तु कुछ पाश्चात्य विद्वानो एव आलोचको ने इस विषय मे जो अनुसंधान किया है उसके आधार पर अनेक विचारधारायें प्रस्तुत करते हुये उनके द्वारा अनेक वादो की स्थापना की गई है। इन वादो मे से कुछ का सम्बन्ध धार्मिक भावनाओ से है तथा कुछ का लौकिक लीलाओ अथवा रीति-रिवाजो से। इन सभी वादो का विभाजन तीन भागो में किया जा सकता है —
(१) परम्परागतवाद, (२) धार्मिक भावनावाद, (३) लौकिक लीलावाद।
(१) परम्परागतवाद
**(१) द्युलोकवाद—**धर्मप्रधान भारतीयो का यह विश्वास है कि नाट्य विज्ञान का प्रादुर्भाव द्युलोक से हुआ है। इसके प्रकटीकरण का काल त्रेता युग में माना गया है। सत्ययुग मे तो सभी प्राणी प्रसन्न व सुखी थे। त्रेता युग के आने पर दुःखों का आविर्भाव हुआ, इसी कारण मनोरजन अथवा मनोविनोद की भी आवश्यकता प्रतीत हुई। अतः देव तथा दानव मिलकर ब्रह्मा के समीप गये और उनसे कहा कि कुछ समय के लिये ही दुःखों से छुटकारा प्राप्त करने के हेतु कोई मनोविनोद का साधन हमे प्रदान कीजिये कि जिससे हम लोग कुछ समय के लिए कष्टो को भूल जाया करें। उन्होंने ध्यानावस्थित होकर संसार के प्राणियो के हितार्थ नाट्यवेद नामक पंचम वेद का सृजन किया (जिसका सूक्ष्म वर्णन अभी किया जा चुका है)। उक्त नाट्य-कला की रचना में शिवजी ने ताण्डवनृत्य, पार्वती जी ने लास्यनृत्य तथा विष्णु जी ने चार प्रकार की वृत्तियों का समावेश पूर्ण कर पूर्ण कलात्मकता को ही उत्पन्न कर दिया। इतना ही नहीं, देवलोक के निर्माण-कार्य-विज्ञ विश्वकर्मा ने एक मनोहर रंगमंच का निर्माण किया तथा उस पर रूपको (नाटको) का अभिनय भी सम्पन्न होने लगा। प्राचीनतम नाटक थे—"त्रिपुरदाह" और "समुद्रमन्थन", जिनका अभिनय इन्द्रध्वज-पर्व के अवसर पर किया गया था तथा जिसमे पुरुषों का अभिनय पुरुषो द्वारा और स्त्रियों का अभिनय स्त्रियो द्वारा प्रस्तुत