मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in contextप्रथमोऽङ्कः ८३
उस समय नन्द के जीवित रहने पर बार-बार चलायमान होती हुई जो राज्यलक्ष्मी पराक्रमी एवं नीतिनिपुण वक्रणास आदि अच्छे मंत्रियों के द्वारा स्थिरता को प्राप्त नही कराई गई और जो (अब) ( चन्द्रिका पक्ष में चन्द्रमा से और राज्यलक्ष्मी पक्ष में चन्द्रगुप्त से ) अभिन्नता को प्राप्त एवम् संसार को आनन्दित करने वाली है, उसको चन्द्रमा के समान राजा चन्द्रगुप्त से अलग करने का प्रयत्न कौन करेगा ? ॥२३॥
और भी। ['आस्वादितद्विरदशोणितशोणशोभाम्'—इस पूर्वोक्त (श्लोक) को पढ़ता है।]
चन्दनदास—[ मन में ] इसकी आत्मप्रशंसा ( दंभ ) तो ( नन्दविनाश-रूप ) फल के अनुरूप ( शोभित होता ) है।
[ नेपथ्य में कोलाहल मचता है। ]
टिप्पणी—मा मस्थाः—मत समझो। √मन् + लुङ्—थास् 'माङि लुङ्' इत्यनेन भविष्यति लुङ्, 'न माङ्योगे' इत्यनेन अडागमप्रतिषेधः। इसका कर्ता 'त्वम्' लुप्त है। नन्दे—नवनन्देषु। अत्र जातावेकवचनम्। विक्रान्तैः—पराक्रमी। वि√क्रम् + क्त वर्तमाने। यह 'सुसचिवैः' का विशेषण है। नय-शालिभिः—नीतिज्ञ। नीयते अनेन इति √नी + अच् करणे बाहुलकात् अथवा नयति राजानम् इति √नी + अच् कर्तरि = नयः = नीतिः। तेन शालन्ते शोभन्ते इति नयशालिनः नय √शाल् + णिनि 'सुप्याजातौ'··· इत्यनेन। तैः। यह भी 'सुसचिवैः' का विशेषण है। वक्रणासादिभिः—वक्रणास आदि—वक्रा नासा यस्य स वक्रणासः बहुव्रीहि स०; 'अज्नासिकायाः संज्ञायाम्'—इत्यनेन अच्प्रत्ययः नासिकायाः नसादेशश्च, ततः 'पूर्वपदात् संज्ञायामगः' इत्यनेन णत्वम्। वक्रणासः आदौ येषां ते वक्रणासादयः; तैः। यह भी 'सुसचिवैः' का विशेषण है। चन्द्रात्—अत्र 'पृथग्विनानाना'—इति सूत्रेण पृथकयोगे पञ्चमी अथवा 'ध्रुवमपाये'—इत्यनेन अपादाने पञ्चमी। चन्द्रगुप्तनृपतेः—चन्द्रगुप्तश्चासौ नृपतिश्च कर्मधारय स०, तस्मात्। यहाँ भी 'चन्द्रात्' की तरह पञ्चमी हुई है। इस श्लोक मे श्रौती पूर्णोपमा अलंकार है। लाटी रीति है, ओज गुण है, वीर रस है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है। छन्द का लक्षण श्लोक १२ में दे०। व्यवस्येत्—यत्न करे। वि—अव √सो + लिङ्—यात् सम्भावनायाम्। संवादितम्—