Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 162 of 488

Read in context
Page 162

प्रथमोऽङ्कः ५६

चाणक्य—शार्ङ्गरव ! शार्ङ्गरव !

[ प्रवेश करके ]

शिष्य—आचार्य ! आज्ञा दीजिए ।

चाणक्य—वत्स ! दवात और कागज ले आओ ।

शिष्य—आचार्य की जो आज्ञा । [ बाहर जाकर और फिर प्रवेश करके ] आचार्य ! यह दवात और कागज है ।

चाणक्य—[ पत्र लेकर मन में ] इस पर क्या लिखूँ ? इसी लेख से तो राक्षस को जीतना है ।

[ प्रवेश करके ]

प्रतीहारी—आर्य की जय हो ।

चाणक्य—[ हर्षपूर्वक मन में ] 'जय' शब्द का ग्रहण कर लिया ( अर्थात् विजय मिल गई ) । [ प्रकट ] शोणोत्तरे ! कैसे आना हुआ ?

टिप्पणी—नचिरात्—शीघ्र । यहाँ 'न' नञ् से भिन्न निषेधार्थक अव्यय है । 'चिरात्' भी चिरार्थक अव्यय है । न चिरात् सुप्सुपा स० । अपवर्गे तृतीया । अव्ययत्वात् सुब्लोपः । किमत्र लिखामि—यहाँ चाणक्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये पुनः उद्यम करता है । अतएव गुप्तचर के वृत्तान्त से अन्तरित बीज की पुनः प्रवर्त्तना होने के कारण यह बिन्दु है । कहा भी है—'अवान्तरार्थविच्छेदे विन्दुरच्छेदकारणम्' साहित्यदर्पण । प्रतीहारी—राजा के निकटवर्ती द्वार पर रहने वाली स्त्री प्रतिहारी कहलाती है । यह सन्धिविग्रह आदि कार्यों का निवेदन करती है—

'द्वारि द्वाःस्थे प्रतीहारः प्रतीहार्यप्यनन्तरे । सन्धिविग्रहसम्बद्धं नानाकार्यसमुत्थितम् ॥
निवेदयन्ति याः कार्यं प्रतीहार्यस्तु ताः स्मृताः ।'

राक्षसो जेतव्यः—चाणक्य जैसे ही इन शब्दो का उच्चारण करता है वैसे ही एक अप्रत्याशित व्यक्ति आकर कहता है—'आपकी जय हो' । चाणक्य इसे शुभ शकुन समझकर अपनी भावी विजय के सम्बन्ध मे आशान्वित होते हुए कह उठता है—'जय मिल गई' । नाटक की परिभाषा में इसको 'गण्ड' कहते हैं—'गण्डः प्रस्तुतसम्बन्धिभिन्नार्थं सहसोदितम्' । गृहीतोऽयं जय शब्दः—यह इस नाटक का पहला पताकास्थान है, जिसका लक्षण यह है—'यत्रार्थे