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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 154 of 488

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Page 154

प्रथमोऽङ्कः (५१)

चाणक्यः— [ सक्रोधम् ] ननु वक्तव्यं स्वजीवितं न सहन्ते इति । भद्र, अपि ज्ञायन्ते नामधेयतः ?

चरः— कहं अजाणिअणामहेआ अज्जस्स णिवेदिअन्ति ? ( कथमज्ञातनामधेया आर्यस्य निवेद्यन्ते ? )

चाणक्यः— तेन हि श्रोतुमिच्छामि ।

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य— भद्र ? अब बताओ अपने कार्य का समाचार । क्या प्रजाएँ चन्द्रगुप्त में अनुरक्त हैं ?

गुप्तचर— और क्या ? आपके द्वारा विरक्ति के उन-उन कारणों के दूर कर दिये जाने पर प्रातःस्मरणीय महाराज चन्द्रगुप्त मे प्रजाएँ अत्यन्त अनुरक्त हैं। किन्तु फिर भी इस नगर में पहले से ही अमात्य राक्षस के साथ स्नेह तथा सम्मान का व्यवहार करने वाले ऐसे तीन व्यक्ति हैं, जो चन्द्र तुल्य शोभा वाले महाराज की राज्य-श्री का सहन नहीं करते हैं ।

चाणक्य— [ क्रोध के साथ ] तब तो यह कहो कि वे अपने जीवन का सहन नहीं करते हैं । भद्र ! क्या उन्हें नामतः जानते हो ?

गुप्तचर— बिना नाम जाने कैसे आप से निवेदन करता ?

चाणक्य— तो सुनना चाहता हूँ ।

टिप्पणी—स्वनियोगवृत्तान्तम्— अपने कार्य का समाचार । स्वस्य नियोगः । तस्य वृत्तान्तः षष्ठीतत्०, तम् । यह 'वर्णय' का कर्म है । वृषलम्— अत्र कर्मप्रवचनीययोगे द्वितीया । अथ किम्— यह स्वीकारार्थक अव्यय है । तेषु विरागकारणेषु परिह्रियमाणेषु— अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इति सूत्रेण सप्तमी । चन्द्रश्रियः— चन्द्रमा की-सी कान्ति वाले । चन्द्रस्य श्रीः इव श्रीः अस्य बहुव्रीहि स०, तस्य । इसका सम्बन्ध 'श्रियम्' से है । अपि— यहाँ प्रश्नवाचक अव्यय है । 'गर्हासमुच्चयप्रश्नशङ्कासम्भावनास्वपि' इत्यमरः । नामधेयतः— नाम से । अत्र 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इति वर्तिकेन तृतीया । ततः तृतीयान्तात् नामधेयशब्दात् तसिः स्वार्थे । आर्यस्य— यहाँ सम्बन्ध सामान्य में षष्ठी हुई; अन्यथा 'निवेद्यन्ते' के योग मे चतुर्थी होनी चाहिए थी । निवेद्यन्ते— नि√विद् + णिच् + लट् — अन्ते कर्मणि ।