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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 152 of 488

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Page 152

प्रथमोऽङ्कः ४६

अपूर्ण मंडल में तो कहना ही क्या—यह 'अपि' शब्द का अर्थ है। चन्द्रे—यहाँ चन्द्रमा और चन्द्रगुप्त दोनो अर्थ विवक्षित है। श्लोक का गूढार्थ यह है कि राक्षस के भक्त बहुत-मे सुन्दराकृति जन नगर मे विचरण करते है, वे असम्पूर्ण मण्डल वाले चन्द्रगुप्त के विरुद्ध तो है ही पूर्ण मण्डल होने पर भी विरुद्ध जाएँगे। यहाँ चन्द्रपक्ष मे मंडल का अर्थ है विम्ब और राजपक्ष मे उसका अर्थ होता है—निकट और दूर के पडोसी शत्रु, मित्र आदि राज्यो का समूह। इस पद्य मे अप्रस्तुत-प्रशंसा अलंकार है और आर्या छन्द है ॥१६॥

चाणक्यः— [ आकर्ण्यात्मगतम् ] अये, चन्द्रगुप्तादपरक्तान् पुरुषान् जानामीत्युपक्षिप्तमनेन ।

शिष्यः— मूर्ख, किमिदमसम्बद्धमभिधीयते ?

चरः— हंहो बह्मण, सुसंबद्धं जेव्व एवं भवे । ( अहो ब्राह्मण, सुसम्बद्धमेवैतद्भवेत् । )

शिष्यः— यदि किं स्यात् ।

चरः— यदि सुणिदुं जाणन्तं लहे । (यदि श्रोतुं जानन्तं लभे । )

चाणक्यः— भद्र, विश्रब्धं प्रविश । लप्स्यसे श्रोतारं ज्ञातारं च ।

चरः— एसो पविशामि । ( एष प्रविशामि । ) [ प्रविश्योपसृत्य च ] जेदु अज्जो । ( जयत्वार्यः । )

चाणक्यः— [विलोक्यात्मगतम्] कथमयं प्रकृतिचित्तपरिज्ञाने नियुक्तो निपुणकः । [ प्रकाशम् ] भद्र ! स्वागतम् । उपविश ।

चरः— ज अज्जो आणवेदि । [ भूमावुपविष्टः । ] (यदार्य आज्ञापयति । )

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य— [ सुनकर मन में ] अरे ! चन्द्रगुप्त के विरोधी जनो को जानता हूँ, ऐसा इसने संकेत किया है ।

शिष्य— मूर्ख ! यह क्या अटपटी बात बक रहे हो ?

गुप्तचर— बाह्मण महाराज ! यह सुसंगत ही होती ।

शिष्य— यदि क्या होता ?

मु० रा०—४