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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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३४मुद्राराक्षसम्

क्या उच्छेद किया ? और क्या चन्द्रगुप्त की राजलक्ष्मी को स्थिर कर लिया ? [सोचकर] ओह ! नन्दवंश के प्रति राक्षस का भक्तिरूप गुण महान् है। वह नन्दवंश के किसी भी अंश (व्यक्ति) के जीवित रहते चन्द्रगुप्त का मन्त्री नहीं बनाया जा सकता और (इसलिए) नन्दवंश के अंश को राज्य पर प्रतिष्ठित करने के प्रति उसे उद्यमहीन बनाने के विचार से ही हमने बेचारे नन्दवंशी सर्वार्थसिद्धि को तपोवन में चले जाने पर भी मरवा डाला। किन्तु तब भी यह मलयकेतु का सहारा लेकर हमारी जड़ खोदने के लिए अधिक से अधिक प्रयत्न दिखा ही रहा है। [ प्रत्यक्ष के समान आकाश में दृष्टि बांधकर अर्थात् मानो शून्य में राक्षस को ही एकटक देखते हुए ] धन्य हो अमात्य राक्षस, (तुम) धन्य हो। धन्य हो द्विजवर ! धन्य हो। बृहस्पति-तुल्य मन्त्री ! धन्य हो। क्योंकि—

टिप्पणी—अगृहीते—वशीभूत किये गये बिना। यह 'राक्षस' का विशेषण है, जिसमें 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' से सप्तमी हुई है। राक्षस को वश में करना ही चाणक्य का लक्ष्य है और यही इस नाटक का मुख्य उद्देश्य है।

उत्खातम्—उन्मूलन किया। उत् √खन् + क्त कर्मणि। स ग्राहयितु शक्यते—यह कर्मवाच्य का प्रयोग है। कर्तृवाच्य में होगा—'तं ग्राहयितु शक्नोमि'।

तपस्वी—बेचारा। यावत्—पक्षान्तर। 'यावत् साकल्यऽवधारणे' इत्युपक्रम्य 'पक्षान्तरे च' इति मेदिनी। यहाँ एक पक्ष तो है सर्वार्थसिद्धि के मरवा डालने पर राक्षस को चन्द्रगुप्त के विरोध करने से विरत किया जा सकता है और दूसरा पक्ष है सर्वार्थसिद्धि के मरवा डालने पर भी राक्षस विरोध कर ही रहा है।

अस्मदुच्छेदाय—हमारे विनाश के लिए। अस्माकम् उच्छेद अस्मदुच्छेद , तस्मै। तादर्थ्ये चतुर्थी। अमात्य—मन्त्री। अमा = सह वसति इत्यर्थे अमा + त्यप् = अमात्य । सम्बोधने अमात्य इति। श्रोत्रिय—वेदविद्यासम्पन्नब्राह्मण। इसका लक्षण यह है—'जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारै द्विज उच्यते। विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभि श्रोत्रिय उच्यते।' छन्द अधीते इति छन्दस् + घ, छन्दस इत्यस्य श्रोत्रा-देशश्च 'श्रोत्रियश्छन्दोऽधीते' इत्यनेन = श्रोत्रिय। मन्त्रिवृहस्पते—बृहस्पति के समान मन्त्री। बृहता वाचा पति. बृहस्पति. 'तद्बृहतो करपत्यो.'—इत्यनेन सुट् तलोपश्च। मन्त्री वृहस्पतिरिव इति मन्त्रिवृहस्पति- उपमितसमास। सम्बोधने मन्त्रिवृहस्पते इति।