मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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चरागाह को कहते हैं, किन्तु स्थान की भी यह सञ्ज्ञा है । धरणी गोचरो यस्य स बहुव्रीहि स० । यह 'र' का विधेयात्मक विशेषण है । ग्रहाभियोगात्—ग्रह के आक्रमण से । अभि√युज् + घञ् भावे अभियोग । ग्रहस्य अभियोग षष्ठीतत्०, तस्मात् 'भीत्रार्थानां भयहेतु' इत्यनेन पञ्चमी । अभियुक्त —लगा हुआ, सावधान । अभि√युज् + क्त कर्तरि । स्वरव्यक्तिम्—स्वर की स्पष्टता को । वि√अञ्ज् + क्तिन् भावे = व्यक्ति । स्वरस्य व्यक्ति षष्ठीतत्० ताम् । उपलप्स्ये—उपलब्ध करूंगा, पहचानूंगा । उप√लभ् + लृट् —स्ये । नन्दवंश —नन्द ने चाणक्य का अपमान किया था । उसका बदला चुकाने के लिए चाणक्य ने अपनी कूटनीति से नन्दवंश को समूल नष्ट कर दिया था । प्रसभम्—बलात्कार, तत्क्षण । कहते हैं कि सात दिन के भीतर आठ पुत्रों समेत नन्द को चाणक्य ने मरवा दिया था । अदाहि—भस्मसात् कर दिया । √दह् + लुङ् —त कर्मणि । इसका कर्ता 'येन' है । कुटिलमति —कुटिल बुद्धि वाले । कुटिला मति यस्य स । चाणक्य बड़े कठोर राजनीतिज्ञ थे और उनकी बुद्धि दुर्जेय थी । अतएव उन्हें कुटिलमति कहा गया है । कौटिल्य —चाणक्य । कुटिलस्य भाव कौटिल्यम् कुटिल + ष्यञ् भावे । तत् अस्ति अस्य इति कौटिल्य + अच् । अथवा कुटिल एव कौटिल्य कुटिल + ष्यञ् स्वार्थे । कुछ लोग चाणक्य का नाम कौटल्य कहते हैं । कुटल उनके पिता का नाम था । कुटल की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जाती है—'कुटं घटपूर्णं धान्यं लाति गृह्णाति इति कुटल = घटपरिमित धान्य का संग्रह करने वाला अथवा कुट परिवार को भी कहते हैं । तब अर्थ होगा—जो केवल अपने परिवार की जीविका चलाने मात्र धन का संचय करता है । तस्य, कुटलस्य अपत्य पुमान् कौटल्य कुटल + यञ् । चन्द्रस्य ग्रहणम्—यह पद छन्द के अनुरोध से रखा गया है । अथवा 'चन्द्रम् अभिभवितुम् इच्छति' इन शब्दों का प्रयोग होना चाहिए था, जो चूर्णक में आये हैं । श्रुते —सुनने से । √श्रु + क्तिन् भावे = श्रुति , तस्या हेतौ पञ्चमी । सनाम्न —तुल्य नाम वाले । समानं नाम यस्य स सनामा बहुव्रीहि स०, 'ज्योतिर्जनपद'—इति सूत्रेण समानस्य सादेश , तस्य । यह 'मौर्येन्दो' का विशेषण है । मौर्येन्दो —चन्द्रगुप्त का । पुराण के अनुसार मुरा नाम की एक शूद्रा राजा नन्द की उपपत्नी थी । उसी का पुत्र चन्द्रगुप्त था । मुराया अपत्य पुमान् इति मुरा + ण्य 'कुर्वादिभ्यो ण्य' इत्यनेन = मौर्य । मौर्य इन्दुरिव इति मौर्येन्दु उपमित स०, तस्य । शेषे षष्ठी अथवा 'उभयप्राप्तौ कर्मणि' इत्यनेन कर्मणि षष्ठी । द्विपदभियोग —शत्रु का