मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी
Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)
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का प्रोक्षण आदि संस्कार नहीं हो सकता है । इसके समाधान में कहा जा सकता है कि
आकृति के वाच्य होने पर भी उसके द्वारा लक्षणावृत्ति के द्वारा व्यक्ति की उपस्थिति
हो जायगी । अतः, व्रीहि आदि का प्रोक्षण हो सकता है ।
इस प्रसङ्ग में पूर्वपक्षी का यह कथन है कि व्यक्ति में शक्ति मानने वालों के मत
में भी व्यक्ति में शब्द की वाच्यता होने पर भी उसके उपलक्षण के रूप में जाति की भी
प्रतीति होती है । उपलक्षण अर्थात् अनन्वयी विशेषण अर्थात् जो विशेषण विशेष्य के
साथ अन्वित न होकर भी विशेष्य की स्वतन्त्रता का बोध कराता है—उसको उपलक्षण
कहा जाता है । वह जो लाल कपड़ा पहने हुआ है वह देवदत्त है । इसी प्रकार जिस
घर से काक उड़ रहा है—वह देवदत्त का घर है । यहाँ रक्तवस्त्र एवं काक उपलक्षण
है । इन स्थलों में रक्तवस्त्र या काक देवदत्त या गृह की स्वतन्त्रता का निर्देशक होने पर
भी वे वाक्य के तात्पर्य के अन्तर्गत नहीं हैं शुद्ध देवदत्त या घर ही शब्द के द्वारा अभि-
हित होता है । वैसे ही प्रकृत में उपलक्षण रूप में जाति का बोध होने पर भी जाति
शब्द का वाच्य नहीं है, वरन् शुद्ध व्यक्ति ही शब्द का वाच्य है । अतः, व्यक्ति के
अभिधेय होने पर भी जाति का उपलक्षण रूप में भान होता है । इस प्रकार जाति में
शक्ति मानने वालों के मत में जाति अभिधेय और व्यक्ति की उपलक्षण के रूप में प्रतीति
होती है और व्यक्ति में शक्ति मानने पर व्यक्ति वाच्य एवं जाति की उपलक्षण के रूप में
प्रतीति होती है । इन दो मतों में कौन मत समीचीन है ? इसके उत्तर में जाति को
अभिधेय मानना ही उचित है । क्योंकि, आकृति को अभिधेय मानने में लाघव है, यदि
व्यक्ति को वाच्य माना जाय तो अनन्त व्यक्ति में अनन्त शक्ति की कल्पना माननी
पड़ेगी, अतः, कल्पना गौरव होगा । इसलिए, लाघव की दृष्टि से जाति को शब्द का
अभिधेय मानना उचित है । व्यक्ति में शक्ति मानने पर दूसरी आपत्ति यह भी है कि
व्युत्पत्ति के समय जिस व्यक्ति में शक्ति गृहीत होगी, उस व्यक्ति को छोड़कर अन्य में
शक्ति गृहीत नहीं हो सकती है । क्योंकि जो सामान्य एवं विशेष से रहित है, उसी को
व्यक्ति कहा जाता है । अतः सामान्य-विशेष रहित गोव्यक्ति में शक्ति गृहीत होने पर
भी उसके आधार पर अत्यन्त भिन्न अन्य गोव्यक्ति का भी ज्ञान माना जाय तो अश्व-
व्यक्ति का बोध उससे क्यों नहीं होगा ? क्योंकि, गोव्यक्ति के समान ही अश्वव्यक्ति भी
सामान्य-विशेष-विनिर्मुक्त ही है ।
जाति में शक्ति मानने पर, उत्पन्न, उत्पद्यमान सभी व्यक्तियों की प्रतीति हो
सकती है । क्योंकि व्यक्ति तथा जाति अत्यन्त भिन्न नहीं है । अतः, जाति में शक्ति
मानने पर किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं है । इसी प्रकार शुक्ल गोव्यक्ति को दिखाकर
गो शब्द का अर्थ अभिहित करने पर वह पुरुष जब कृष्णवर्ण की गो को देखेगा तब
उसको अर्थ बोध नहीं होगा । क्योंकि, शुक्लवर्ण की गोव्यक्ति से कृष्णवर्ण की गोव्यक्ति
भिन्न है । अतः पूर्व कथित दोषों को दृष्टि में रखकर व्यक्ति को शब्द का अभिधेय नहीं