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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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५८० मीमांसादर्शनम् [ सू०
है, क्योंकि नाभि से उत्थित वक्षःस्थल में विस्तार प्राप्त नाद का कण्ठ आदि स्थलों से
संस्पर्श कर विशेष आकार में अभिव्यक्त करने के लिए प्रयत्न आवश्यक है और जिस रूप
में उच्चारण करना चाहता है, उससे भिन्न रूप में ही उच्चारण हो जाता है। इसलिए
एक ही शब्द अनादिकाल से आ रहा है। किन्तु वक्ता विशेष के उच्चारण के दोष से
उसमें विकार आ जाता है और उसका भिन्न रूप में उच्चारण होने लगता है। उस व्यक्ति
विशेष के सम्पर्क से उस सम्प्रदाय के अन्य व्यक्ति भी उस विकृत उच्चारण के अनुसार
ही प्रयोग करते हैं, और इस प्रकार की उपपत्ति दृष्ट उच्चारण के अनुरूप ही है।
अतः दृष्ट विरुद्ध न होने से अर्थापत्ति प्रमाण के आधार पर जो सभी शब्दों को साधु
मानने की युक्ति समीचीन नहीं है। अन्यथा उपपन्न होने पर अर्थापत्ति प्रमाण के आधार
पर किसी की साधुता का स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अतः गो, गावी आदि
शब्दों में एक ही अनादि है, और वही साधु है, अतिरिक्त शब्द अनादि न होने से अपभ्रंश
या असाधु हैं। अनादि वाचक शब्द ही अशक्ति के कारण अनेक आकारों में परिवर्तित
हो गये हैं, और ये ही प्राकृत आदि में प्रयुक्त होते हैं। अतः प्राकृत भाषा के प्रयुक्त
शब्द ही साधु एवं संस्कृत की अपेक्षा प्राचीन है—यह कथन युक्तियुक्त नहीं है।
‘शब्दे अपराधस्य भागित्वम्’ शब्द में अपराधभागिता अर्थात् दुष्टता होती है।
‘प्रयत्ननिष्पत्तेः’ क्योंकि प्रयत्न के सहयोग से उसका उच्चारण होता है। शब्द का
उच्चारण प्रयत्न सापेक्ष है, अतः शब्द में अपराधभागिता अर्थात् दुष्टता सिद्धान्त सिद्ध है।
आशय यह है कि आलस्य, प्रमाद आदि के द्वारा शब्द जिस प्रकार यत्नपूर्वक
उच्चारण करना चाहिए, वैसा उच्चारण करने में असमर्थ होने पर गावी आदि उच्चारण
होता है, और इस उच्चारण से अपभ्रंश की परम्परा के क्रम में एक शब्द के अनेक
अपभ्रंश हो जाते हैं ॥ २५ ॥
अन्यायश्चानेकशब्दत्वम् ॥ २६ ॥
शा० भा०—न चैष न्यायो यत्सदृशाः शब्दा एकमर्थमभिनिविशमानाः सर्वे-
विच्छिन्नपारम्पर्या एवेति प्रत्ययमात्रदर्शनादभ्युपगम्यते, सादृश्यात्साधु-
शब्देऽप्यवगते, प्रत्ययोऽवकल्प्यते¹। तस्मादमीषामेकोऽनादिः। अन्येऽपभ्रंशाः।
हस्तः करः पाणिरित्येवमादिषु त्वभियुक्तोपदेशादनादिरमीषामर्थेन सम्बन्ध
इति ॥ २६ ॥ सिद्धान्ते युक्तिः ॥
भा० वि०—सूत्रं व्याचष्टे—न चैष न्याय इति। घटः कलशः कुम्भः इत्यादि
व्यवच्छेत्तुं सदृशा इत्युक्तं शालामालेत्यादिव्यवच्छेदाय—एकमर्थमिति। कथ-
१ ब. वकल्पते।