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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

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१५ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ४८५
है कि गोबर के द्वारा निर्मित प्रतिमा का दुर्वा आदि से पूजाकर उसके साथ बन्धुत्व की
कल्पना ही आह्लीनैवुक है—यह कतिपय व्यक्तियों का मत है । अन्य आचार्यों की दृष्टि में
मङ्गलवार को दही के मन्थन को आह्लीनैवुक कहा जाता है । कतिपय आचार्यों ने प्रतिदिन
एक मुट्ठी चावल को एक महीने तक पात्र में डालकर उससे घी में एक पूआ बनाकर
देवता के पूजन को आह्नीनैवुक माना है (गोमयमयीं देवतां दूर्वादिभिरभ्यर्च्य ज्ञातित्व-
कल्पनमाह्लीनैवुकमित्येके मङ्गलवारे दधिमन्थनमित्यन्ये । प्रतिदिनं तण्डुलमुष्टिं मासमेकं
भाण्डे निक्षिप्य घृतेन तेनापूपकं देवतापूजनमित्यपरे) [न्यायतात्पर्यपरिशुद्धि पृ० २९२]
इस अवसर पर 'उद्वृषभयज्ञ' आदि उदोच्य=उत्तरदेश में रहने वालों के लिए अनुष्ठान
के योग्य है।
उत्तरापथ में रहने वाले व्यक्ति ज्येष्ठमास की पूर्णिमा को अनेक वृषमोंका पूजन
कर उनकी दौड़ कराते हैं—इसी को उद्वृषभ कहा जाता है। राजस्थान, बिहार आदि
स्थानों में दिवाली के बाद गोवर्धन की पूजा के दिन यह प्रचलित है। सम्प्रति इसकी
छाया मात्र गोपों एवं ब्राह्मणों के द्वारा सुरक्षित है। कृषक गण बैलों को खिला पिलाकर
इस दिन पूजा करते हैं। अनेक रङ्गों से इनकी सींग रंगी जाती है तथा पूजा की जाती
है । (ज्येष्ठमासस्य पौर्णमास्यां बलीवर्दानभ्यर्च्य धावयन्ति सोऽयमुद्वृषभयज्ञ इति ।)
[न्यायमालाविस्तर १।३।१९] इसी प्रकार शिखाकर्म में भी कोई एक शिख कोई दो
शिख आदि ।
इन शिष्टाचारों या कुलाचारों से श्रुति का अनुमान किया जाता है। मूलभूत
श्रुतियों ने ही इस प्रकार विशेष-विशेष स्थानों में विशेष-विशेष सम्प्रदायों के द्वारा
अनुष्ठेय को कर्तव्य मानकर उपदेश किया है । आचार के द्वारा जब श्रुति का अनुमान
किया जाता है, आचार ही जब श्रुति के अनुमान के लिए साधन है=हेतु है। ऐसी
स्थिति में अनुमेय श्रुति हेतुविशिष्ट होगी, क्योंकि, जहाँ हेतु रहता है, वहाँ साध्य रहता
ही है—यही नियम है। जैसे जहाँ धूम रहेगा उस स्थान विशेष में साध्य वह्नि रहेगी,
वहाँ वह्नि का अनुमान होगा। इस प्रकार ये आचार विशेष-विशेष स्थान में वहाँ के
व्यक्तियों के लिए ही कर्तव्य है—वह अन्य स्थान के व्यक्तियों के लिए कर्तव्य नहीं है।
इसी लिए सामवेदी आदि के लिए ही गौतमादि स्मृति के आचार मान्य होंगे अन्य
व्यक्तियों के किए मान्य नहीं होंगे। इसी प्रकार होलाकादि आचार पूर्व देशीय से
अतिरिक्त के लिए कर्तव्य नहीं है। क्योंकि, मूलभूत श्रुति में इस प्रकार की विधि
ही उचित है। जैसे—राजसूय यज्ञ क्षत्रियों के लिए ही कर्तव्य है, एवं वैश्य स्तोम वैश्य
के लिए ही अनुष्ठेय है—यह पूर्व पक्ष है।
“अनुमानव्यवस्थानात्”=जिसके द्वारा अनुमित होता है अर्थात् स्मृति और श्रुति
के साधन या कारण स्वरूप शिष्ट जनों के द्वारा स्वीकृत देशाचार की व्यव्स्था या नियम
होने से “प्रमाणम्”=आचार का मूलभूत अनुमित श्रुतिरूप प्रमाण” तत्संयुक्त=देश