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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 35 of 804

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[ २७ ]
कल्पसूत्रकार कात्यायन ने भी 'यज्ञं व्याख्यास्यामः द्रव्यं देवतात्यागः' (१।२।१।२)
यही कहा है। इसी विषय को श्रुति भी कहती है 'यस्यै देवतायै हविगृंहीतनस्ततां
ध्यायेत वषट् करिष्यन्'।
ऐतरेय ब्राह्मण (३।१।८) इत्यादि वेद वचन से देवता का ध्यान कर हविष्य का
त्याग करना चाहिए। यह भी दोनों पक्ष में स्मरणीय हैं। शबरस्वामी ने मीमांसा दर्शन
के (९।१।९) देवताधिकरण भाष्य में कहा है वह प्रौढ़िवाद मात्र है। क्योंकि खण्डदेव
ने अपने भाट्टकौस्तुभ में इस विषय का सिद्धान्त उपस्थापित किया है। भाष्यकार ने छठे
अध्याय के प्रथम पाद के पंचम सूत्र के तिर्यगधिकरण भाष्य में 'न देवानां देवतातन्तरा-
भावाद्' इस वचन से सामञ्जस्य भी नहीं होता है। वहाँ टीका में कुमारिल भट्ट ने कहा
है येषां शब्द एव देवता तेषां अप्युक्तो ग्रन्थः अर्थात् जिसके मत में विग्रहवान् देव नहीं हैं
अपि तु शब्दमयी देवता है उस मत में यह युक्ति संगत नहीं होता है। अतः यदि यह
माना जाय कि देवता का विग्रहवत्त्व का आलाप सामञ्जस्य की दृष्टि से शास्त्रीय
सिद्धान्त नहीं है। अन्यथा संकर्षकाण्ड की देवततत्त्वालोचना व्यर्थ हो जायगी। इसी-
लिए उत्तर मीमांसा के देवताधिकरण में पाँच विग्रह प्रदर्शित किया गया है।
विग्रहो हविषां भोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता।
फलप्रदानमित्येतद् पञ्चकं विग्रहादिकम् ॥
इच्छानुसार शरीर धारण यज्ञ में प्रदत्त हविः का भक्षण, सभी पर प्रभुत्व, हविः
की प्राप्ति से तृप्ति, फलदातृत्व ये पाँच विग्रहादि कहे गये हैं। अतः कर्म-प्रतिपादनपरक-
मीमांसा शास्त्र में कर्म का प्राधान्य स्वाभाविक है। इस विषय में एवं विस्तृत विश्लेषण
आगे के खण्डों में प्रस्तुत करने जा रहा हूँ एवं आचार्यों का इतिहास भी अन्य खण्ड में
प्रस्तुत करूँगा। इस प्रसङ्ग में इतना ही कहना उचित होगा कि कर्म और ज्ञान का
प्राचीन शास्त्रीय विषय विशेष में शास्त्रीय तात्पर्य न होने के कारण परवर्तीकाल की
देन है। आर्यभावना दीहि की उपासना है और स्वर्गचिन्मयभूमि मुक्ति और प्रस्तुत
प्रकाशन में एक ही है। जैमिनि प्रणीत मीमांसा सूत्र शबरस्वामि प्रणीत शाबरभाष्य
कुमारिलभट्टकृत तन्त्रवार्तिक, गोविन्द स्वामिकृत भाष्य विवरण जिसे युधिष्ठिर
मीमांसक ने सर्वथा दुर्लभ माना है उसका प्रथम प्रकाशन एवं तंत्रवार्तिक की श्री सोमे-
श्वरभट्ट विरचित सर्वानवद्यकारिणी न्यायसुधा एवं अन्त में भाष्य का सार संकलन
'भाष्यभावप्रकाशिका' प्रस्तुत किया गया है।
मैं अपने पूज्य गुरुदेव विद्यावाचस्पति, श्री ब्रह्मदत्तद्विवेदी का आभार वहन करता
हूँ एवं दार्शनिकसार्वभौम न्यायरत्न तर्करत्न स्व० दामोदरलाल गोस्वामी जिनके द्वारा
मुझे इन ग्रन्थों के लेखन की शक्ति प्राप्त हुई। पंडितप्रवर मीमांसारत्न श्री यस० सुब्रह्मण्य
शास्त्री ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन में पूर्ण सहयोग एवं अनेक शास्त्रीय समस्याओं के