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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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भार प्राप्त था—कुमारिल भट्ट के तन्त्रवार्तिक से यह अवगत होता है कि जैमिनि ने
छान्दोग्यानुवादादि ग्रन्थों की रचना की थी । किन्तु यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है । मीमांसा
शास्त्रों के संकर्षं काण्ड की रचना जो चार अध्याय में थी वह भी जैमिनि ने की थी ।
उसमें उपासनातत्त्व का विश्लेषण था । इसी संकर्षं काण्ड का दूसरा नाम देवता काण्ड
था । प्रपञ्च हृदय में चार अध्याय में इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में वर्णित विषय देवता
तत्त्व का वर्णन है । द्वितीय अध्याय में विधि, अर्थवाद, नामधेय देवता का विशेषत्व
आदि वर्णित हैं । तृतीय अध्याय में देवता एक ही साथ में अनेक शरीर को धारण कर
सकते हैं, अनेक स्थान में व्यक्त हो सकते हैं और अपनी इच्छानुसार तिरोहित हो सकते
हैं । चतुर्थ अध्याय में सत्कर्म के फलस्वरूप देवत्व लाभ अपवर्ग या क्रममुक्ति का निर्देशन
है । देवता तत्त्व का प्रतिपादन होने के कारण ही यह उपासना काण्ड के नाम से
विख्यात है ।
महामुनि बोधायन ईसा से पूर्व का माना गया है । इन्होंने द्वादशलक्षणी मीमांसा के
चार अध्यायात्मक संकर्षं काण्ड एवं उत्तर मीमांसा के ऊपर कृतकोटिभाष्य नामक
विशाल भाष्य की रचना की थी । वृत्तिकार उपवर्ष ने बीस अध्याय के ऊपर वृत्ति की
रचना की थी । अनन्तर देवस्वामी ने उत्तर कांड के चार अध्यायों को छोड़कर सोलह
अध्याय पर भाष्य की रचना की थी । भवदास भट्ट ने भी संक्षिप्त व्याख्या की थी । ये
नाम प्राचीन उक्ति से ही ज्ञातव्य है । कालक्रम ने भगवान् शबर स्वामी ने सिद्धान्त
बोधोपयोगी संक्षिप्त भाष्य की रचना की जो आज प्राचीनतम आदर्श स्थानीय है । भाष्य
का लक्षण लिखते हुए कहा गया है जिसमें श्रुतगत पदों का ग्रहण कर स्वनिबद्ध सूत्रा-
नुकारी पदों की व्याख्या की है उसी को भाष्य कहा जाता है ।
सूत्रस्थं पदमादाय पदैः सूत्रानुसारिभिः ।
स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥
भाष्य लक्षण की ओर विशेष दृष्टिपात न करने के कारण न देवानां देवतातन्त्रा-
भावाद् इत्यादि अनेक भाष्य वचत्रिमिश्रिक भ्रान्ति क्रम में परिगणित हो गया है ।
इस प्रकार के वर्णन की सार्थकता प्रदर्शन प्रसंग में यह कहा जा सकता है, शिष्टों
का ऐसा व्यवहार रहा है कि विद्वान् संक्षेपोक्ति पूर्वक विस्तृत विषय में प्रस्तुत करते हैं,
यही विद्वानों की शैली है । 'इष्टं विदुषां लोके समासव्याससाधारणम्' भाष्यकार की
प्रामाणिकता और श्रेष्ठता तो इसी से सिद्ध है कि ज्ञानमूर्ति शंकर ने भी अपने
भाष्य में यद्यपि 'शास्त्रतात्पर्यविदामनुक्रमणम्' इत्यादि अंश में पूजार्थक बहुवचन का
प्रयोग किया है । यह सत्य है कि आचार्य शंकर ने शास्त्रतात्पर्यवेत्ता कहते हुए भी
उनका खण्डन किया है, क्योंकि शबरस्वामी कर्मवादी थे और आचार्य शंकर ज्ञाना-
त्मक अद्वैतवादी थे । शबरस्वामी ने यागयज्ञ की प्रधानता क्रम में देव-देवी के विग्रहवत्त्व
का खण्डन किया है, और आचार्य शंकर ने आसमुद्र हिमाचल भारत के सभी देवी-