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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 310 of 804

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Page 310

१५८ श्रीमीमांसादर्शनम् [ सू०
मनुष्य ने किया है—यह भी नहीं कहा जा सकता है। अतः जिस स्मृति वाक्य का
मूलभूत कोई वेदवचन मिलेगा; वही स्मृति वचन प्रमाण होगा । अतः, इस प्रसङ्ग में
यही कहा जा सकता है कि स्मृतियाँ अन्ध परम्परा के समान हैं जैसे कोई जन्म से अन्धा
व्यक्ति यह कहता है कि वह इस वस्तु के वर्ण का स्मरण कर रहा है । उस व्यक्ति से
यह जिज्ञासा की जाय तुमने इस वस्तु का किस प्रकार अनुभव किया ? इसके उत्तर में वह
किसी दूसरे जन्मान्ध व्यक्ति का निर्देश कर कहता है कि मैंने उस अन्धे की बात सुनकर
अनुभव किया है, उस जन्माध से जिज्ञासा करने पर वह भी किसी जन्मान्ध के द्वारा श्रुत
को ही अपने अनुभव का आधार बताता है तो उनका कथन अप्रामाणिक होगा । अतः,
प्रकृत में स्मृतियों के धर्मोपदेश की यही स्थिति है । इसलिए स्मृति वाक्य पौरुषेय होने से
ये आचारमूलक या अन्य स्मृतिमूलक या भ्रान्तिमूलक है—यह निश्चित नहीं कहा जा
सकता है । अतः, इस प्रकार के स्मृति वचन—'अनपेक्षं स्यात्' अपेक्षित अर्थात् आदर-
णीय नहीं है, इन स्मृतियों पर आस्था की स्थापना कर धर्म-कर्म करना उचित नहीं
है—यही पूर्वपक्ष का आशय है ।
'धर्मस्य' धर्म के, शब्दमूलत्वात् = शब्दमूलक होने से, वेद प्रमाणकता साधन
होने से, 'अशब्दम्' = जो साक्षात् वेद वचन के द्वारा विहित नहीं हैं, अतः (वे)
'अनपेक्षम्' = अपेक्षारहित अर्थात् अनादरणीय, 'स्यात्' = होंगे। अतः वेद ही धर्म में
प्रमाण है, अतः जो कण्ठतः अर्थात् श्रुति वचन से नहीं कहे गये हैं उसको धर्म का
प्रमाण मानकर ग्रहण नहीं किया जा सकता है ॥ १ ॥
अपि वा कर्तृसामान्यात्प्रमाणमनुमानं स्यात् ॥ १.३.२ ॥ सि०
शा० भा०—अपि वेति पक्षो व्यावर्त्यते । प्रमाणं स्मृतिः । विज्ञानं हि तत्कि-
मित्यन्यथा भविष्यति पूर्वविज्ञानमस्य नास्ति, कारणाभावादिति चेत् ?
अस्या एव स्मृतेर्द्रष्टिम्र्नः कारणमनुमास्यामहे । तत्तु नाननुभवनम्, अनुपपत्त्या ।
न हि मनुष्या इहैव जन्मन्त्येवंजातीयकमर्थमनुभवितुं शक्नुवन्ति । जन्मान्तरा-
नुभूतं च न स्मर्यते । ग्रन्थस्त्वनुमीयेत, कर्तृसामान्यात्स्मृतिवैदिकपदार्थयोः ।
तेनोपपन्नो वेदसंयोगस्त्रैवर्णिानाम् ।
ननु नोपलभन्त एवंजातीयकं ग्रन्थम् । अनुपलभमाना अप्यनुमिमीरन्,
विस्मरणमप्युपपद्यत इति तदुपपन्नत्वात्पूर्वविज्ञानस्य । त्रैवर्णिकानां स्मरतां
विस्मरणस्य चोपपन्नत्वाद् ग्रन्थानुमानमुपपद्यत इति प्रमाणं स्मृतिः । अष्ट-
कालिङ्गाश्च मन्त्रा वेदे दृश्यन्ते यां जनाः प्रतिनन्दन्तीत्येवमादयः ।
तथा प्रत्युपस्थितनियमानाम्, आचाराणां दृष्टार्थत्वादेव प्रामाण्यम् । गुरो-
रनुगमनात्प्रीतो गुरुरध्यापयिष्यति ग्रन्थग्रन्थिभेदिनश्च न्यायात्परितुष्टो वक्ष्यतीति ।
तथा च दर्शयति, तस्माच्छ्रेयांसं पूर्वं यन्तं पापीयान्पश्चादन्वेतीति । प्रपास्त-
डागानि च परोपकाराय, न धर्मायेत्येवावगम्यते । तथा च दर्शनम् । 'धन्वन्निव