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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 262 of 804

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Page 262

२१० मीमांसादर्शनम् [ सू०
अथ वा यावल्लिङ्गानुमिताः श्रुतयः प्रतिमन्त्रं कल्पयितुमारभ्यन्ते, तावदनेन
प्रत्यक्षवचनेन चतुःसंख्याविशिष्टास्ते विहितास्तेनाप्राप्तविधिरेव वचनम् । तत्र तु
विनाऽप्येतेन मन्त्रेष्वर्थप्राप्तवत्सु तत्परत्वे मन्दं फलमित्यनन्यलभ्यचतुःसंख्यार्थं
तस्योपदेशः ॥३३॥
न्या० सु०—सूत्रमवतारयितुं न हीति भाष्यं व्याचष्टे—'वदाम' इति । नन्विति
प्रोक्तामाशङ्कामनुभाष्य चतुःसंख्याविशिष्टमितिभाष्येण परिहृतम्, तदादानस्यापीष्टकामृग्व-
यनार्थमर्थप्राप्तावे गुणार्थेनेति च सूत्रविरोधादयुक्तमित्याशङ्क्य व्याचष्टे— यद्यपीति । अर्थं
प्राप्ते चादाने संख्याविधौ भवत्यादानसंख्याविशिष्टेत्यर्थः । विशिष्टादानविध्यभावादरुणै-
काहायनीन्यायानुपपत्तेः अर्थप्राप्तस्य चादानस्यानुवाद्यत्वेनैकविधावितरेण विशेषितुमशक्यत्वा-
त्लिङ्गतश्चैकैकस्यैव मन्त्रस्य प्राप्तेः । संख्यानाकाङ्क्षत्वात्समुच्चयासिद्धेरपरितोषात् फलतो
गुणार्थत्वप्रतिपादनपरत्वेनान्यथा व्याचष्टे—अथ वेति ॥ ३३ ॥
भा० प्र०—"तां चतुर्भिरभ्रिमादत्ते" (श० ब्रा० ६।३।१।१९) इत्यादि ब्राह्मण
वाक्यों के मन्त्रों से प्रकाशित विषय का ही उल्लेख किया गया है, चतुःसंख्या रूप गुण
विधान करना ही इसका उद्देश्य है । अभिप्राय यह है कि अभिग्रहण विषयक चार मन्त्र
हैं, उनमें किसी एक का उच्चारण करके ही अभ्रि का ग्रहण किया जा सकता है, किन्तु,
उक्त ब्राह्मण ग्रन्थ से यह कहा गया है कि अभिग्रहण काल में इन चार मन्त्रों का पाठ
करना चाहिए, इसलिए, इन स्थलों में पुनः उल्लेख न होने पर मन्त्र का स्वार्थ के
प्रकाश में कोई बाधा नहीं है ।
"गुणार्थेन"= गुण विधान रूप प्रयोजन के लिए, "पुनः श्रुति." = पुनः ब्राह्मण
वाक्य पढ़ा गया है ।
इस प्रसङ्ग में पूर्वपक्षी का यह आशय है कि "अभ्रिरसि नार्यसि" (वा० सं०
११।१०) यहाँ से आरम्भ कर "त्रैष्टुभेन त्वा च्छन्दसा ददे" यह मन्त्र कहा गया है, इसी
मन्त्र से अभ्रि के आदान की प्रतीति सिद्ध है, पुनः ब्राह्मण में 'तां चतुर्भिरभ्रिमादत्ते इति
विधीयते' (श० ब्रा० ६।३।१।१९) यह विधान व्यर्थ है । इसके उत्तर में कहा है कि
मन्त्र से प्रतीत अर्थ का ही ब्राह्मण में पुनः श्रवण चार संख्या के विधान के रूप में
उपयुक्त है । चार संख्या लक्षण गुण के लिए विधान न होने पर मन्त्रों में किसी एक
मन्त्र से अभ्रि का आदान हो जाता है ॥ ३३ ॥
परिसंख्या ॥ १.२.३४ ॥
शा० भा०—परिसंचक्षाणे च, इमामगृभ्णन्नित्यश्वाभिधानीमादत्त इति त्रयो
दोषाः प्रादुःष्युरिति । नैवं सम्बन्ध इत्यादत्त इति । कथं तर्हि, इत्याश्वाभिधानी-
मिति । लिङ्गादशनामात्रे शब्दात्तु विशेषेऽश्वाभिधान्यामिति सति च वाक्ये