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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished804 pages

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[ १६ ]
किया। यह वही समय था जब परम करुणामयी श्रुति वृद्धा माता के समान करुणा मात्र
की पात्र बन गई थी। आपात-मधुर पर्यन्त-परिताप-फलक शरीर को ही सर्वस्व मानने
वाली सन्तान-कल्याण-राशि-सम्पादक माता की सेवा से विमुख थी। लोक प्रतिष्ठा
की अभिलाषा से सेवा भले ही किसी ने की, किन्तु यह सेवा नहीं थी, इस सेवा मात्र से
जननी की रक्षा नहीं वरन् क्षयमार्ग की प्रशस्ति थी।
छन्दः-'पदा, कल्पहस्ता', ज्योतिर्नयना, निरुक्तश्रवणा, शिक्षाघ्राणा व्याकरणमुखा
त्रयीमातृका की लोकप्रदर्शन सेवा श्रद्धा, भक्ति, आस्तिक्य एवं आन्तरिकताशून्य
होने पर धर्मबुद्धि और कर्त्तव्यता-बोध-शून्य होने पर स्वच्छन्द पदबन्ध में जननी को
भग्नपदा करता है, कोई अनेक प्रकार के विकल्पों को लाकर उसका कर कम्पन करता
है, तो कोई विज्ञान संवाद में जननी के तिमिर को हटाने में जननी के नेत्र को ज्योति-
विहीन करना चाहता है, तो कोई अपनी उत्प्रेक्षा के आधार पर रुचि-विरुद्ध प्राचीन
अर्थ में अपरिदृप्त होकर सार्वत्रिक भक्ति योग अर्थात् रूपक के साहाय्य से पद पदार्थ की
निरुक्ति के द्वारा माता की श्रवणशून्यता का ही सम्पादन करता है। कोई नवीन तन्त्र
की इच्छा से और दीक्षा की उत्कट गन्ध से बद्धनासिका कर जननी को शिक्षा से
सत्कविराजश्रवणा करता है, कोई व्याकरण को अकारण कर चिर अनवद्य जननी के
मुख पर सुधामती का प्रक्षेप करता है। यही समय की मातृ परिचर्या है। आज के
युग में ऐहिक स्वार्थ की प्रधानता है, लोक प्रतिष्ठा ही प्रयोजन है, धर्माचरणशून्य स्थल
की यही मातृ सेवा हो सकती है, वस्तुतः मातृ सेवा रूप में मातृसेवा है। इन्हीं कारणों से
'बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरेदिति' ।
किसी समय 'ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च, अर्थात् किसो
पार्थिव उपलब्धि की अभिसन्धि से शून्य होकर षडङ्ग वेद ब्राह्मणों के लिए अध्येतव्य एवं
तदर्थं धर्म ज्ञातव्य था। यही कारण था कि सम्प्रदायशून्य अनादिगुरुशिष्यपरम्परा-
विहीन अर्थ से वेद को कुत्सित अर्थ सम्पन्न नहीं करते थे। वेदमूलकशास्त्र की
किसी प्रकार की अर्थ कल्पना जो वेदमूलक नहीं थी, उसके द्वारा उसको म्लान
करने की चेष्टा नहीं करते थे, क्योंकि 'लवादपि त्रुट्यति चापलात्किल' अतः
यह शास्त्रार्थ ऋषि एवं प्राचीन मत के अनुगत नहीं है, इससे बिना कारण ही
शब्द शास्त्र की मर्यादा का लङ्घन ही है, इस प्रकार शब्द के मुख्य अर्थ का उच्छेद
होता है। भिन्न-भिन्न ब्राह्मण ग्रन्थों की पर्यालोचना करने पर महर्षि कात्यायन बौधायन
आदि कल्पतरुकारगण वेद मन्त्रों का जिस रूप में विनियोग किया है, उसके अनुसार
ही भाष्यकार ने वेद के मन्त्रों का अर्थ लिखा है। वेद की मीमांसा में किसी प्रकार का
स्वातन्त्र्य नहीं है। यदि ये लोग चाहते तो अपनी प्रतिभा के बल पर लोकमनोरञ्जन
की दृष्टि से वेद के अर्थ निरूपण में सर्वथा समर्थ थे। किन्तु, ऋषियों की दृष्टि का
उल्लङ्घन करना स्वधर्म एवं कर्त्तव्य के ध्वंस का साधक होता है, अतः इस मार्ग के