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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 227 of 804

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Page 227

३० ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १७५
क्रियां प्रत्युपादानात्, तस्य च यथा वर्त्तमानक्रियत्वस्य गौणत्वे निमित्तं नास्ति, तथा
साधकतमस्य न्यूनापेक्षायां निमित्तं नास्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥
भा० प्र०—पूर्वपक्षी ने शङ्का की है कि शूर्प में अन्नसाधनता न रहने पर उसकी
स्तुति अनुचित है । इसके समाधान में सिद्धान्ती का कहना है कि शूर्प के द्वारा होम की
कर्त्तव्यता श्रुति में उक्त होने पर "तेन हि अन्नं क्रियते" इस प्रकार उपदिष्ट होता है ।
हल आदि वस्तुओं में अन्न की साधनता नहीं है, सभी द्रव्यों से अन्न की निष्पत्ति नहीं
हो सकती है, अतः इन द्रव्यों की अपेक्षा शूर्प की अन्न के प्रति साधनता होने से विहित
शूर्प की स्तुति की जाती है । शूर्प से अतिरिक्त किसी वस्तु में अन्न की साधनता है या
नहीं—यह विचार निष्प्रयोजन है । राम बलवान है—यह कहने पर श्याम, कृष्ण आदि
की अपेक्षा ही उसकी बलवत्ता प्रतीत होती है, व्याघ्र, सिंह आदि की अपेक्षा उसकी
बलवत्ता सिद्ध नहीं होती है ।
'अर्थः' = सफल, 'तु' = किन्तु, "विधिशेषत्वात्" = विधि का शेष या अङ्ग होने
से, "यथा लोके" = जैसे संसार में लौकिक दृष्टान्त में । लौकिक दृष्टान्त में देवदत्त आदि
को बलवान् कहने पर उसके सजातीय कम बल रखने वाले यज्ञदत्त आदि की अपेक्षा ही
उसकी वलवत्ता की प्रतीति होती है । प्रकृत में भी जो द्रव्य अन्न में साधन नहीं है उनकी
तुलना में शूर्प को अन्न का साधन कहा गया है । अतः शूर्प की स्तुति विधि का शेष
या अङ्ग है, यह कथन असङ्गत है ॥ २९ ॥
यदि च हेतुरवतिष्ठेत निर्देशात्सामान्यादिति चेदव्यवस्था
विधीनां स्यात् ॥ १.२.३० ॥
शा० भा०—यद्यपि च भवेदन्नकरणं हेतुर्दवपिठरप्रकाराणाम्, तथाऽपि शूर्प
एवावतिष्ठेत । शब्दादन्नकरणं हेतुरिति विज्ञायते । शब्दश्च शूर्पस्याऽऽह, न दर्वि-
पिठरादीनाम् । तद्धि निर्दिश्यते, यस्माच्छूर्पेणान्नं क्रियते, तस्माच्छूर्पेण जुहो-
तीति । यथा यस्माद्द्बलवदुपध्मातोऽग्नस्तेन मे गृहं दग्धमिति, नानग्निरपि
बलवदुपध्मातो दहतीति गम्यते । अथ मतम्, येन येनान्नं क्रियते प्रणाड्या शूर्पा-
दन्येनापि, तेन तेनापि होमः क्रियत इति । अव्यवस्था विधीनां स्यान्न केनचित् ।
प्रणाड्याऽन्नं क्रियते । तत्र यावदुक्तं स्याज्जुहोतीति, तावदेवान्नकरणेन जुहोतीति ।
अस्मत्पक्षे पुन. शूर्पं स्तूयते । तेन ह्यन्नं क्रियत इति वृत्तान्तान्वाख्यानं न च
वृत्तान्तज्ञापनाय, किं तर्हि, परोचनायैव । तस्माद्धेतुवन्निगदस्यापि स्तुतिरेव
कार्यमिति ॥ ३० ॥
इति तृतीयं हेतुवन्निगदाधिकरणम्